▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

मराठी की चर्चित लेखिका प्रतिभा सराफ मुंबई के एक कॉलेज में फिजिक्स की लेक्चरर रह चुकी हैं। उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, बाल साहित्य और आलोचना सहित अनेक विधाओं में लेखन किया है। उनके मराठी कहानी-संग्रह ‘अनाकलनीय’, जिसे करीब एक दर्जन प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं, का डॉ. गोरख थोरात ने हिंदी में अनुवाद किया है। इसका हिंदी रूपांतरण ‘दस्तखत की मुहर’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।
‘दस्तखत की मुहर’ में 15 कहानियां हैं-‘खुशी के पल’, ‘पूनम का चांद’, ‘कहां गई होगी नताशा?’, ‘उस द्वीप पर’, ‘अधिवास’, ‘सलाम डॉक्टर कुणाल!’, ‘शुद्धिकरण’, ‘यह और वह’, ‘नियति’, ‘भिन्न’, ‘पीड़ादायी संतान अभिभावक संघ’, ‘बेबसी’, ‘माफी’, ‘दत्तक’ तथा शीर्षक कहानी ‘दस्तखत की मुहर’।
पुस्तक के बारे में डॉ. सूर्यबाला लिखती हैं, ‘वैविध्य की दृष्टि से आपको इस संग्रह में एक साथ प्रेम, परिवार और समाज की अन्यान्य परिस्थितियों से लेकर रहस्य, रोमांच, विज्ञान, विट और चमत्कार तक सब कुछ उपलब्ध होगा। सहज पठनीयता इन कहानियों का सर्वोपरि गुण है, जो आद्यंत पाठकों को बांधे रखती है।’
डॉ. सूर्यबाला की इस टिप्पणी से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूं। लेखिका ने बेहद संवेदनशीलता के साथ कहानियों को रचा है। संग्रह की पहली कहानी ‘खुशी के पल’ जितेश और नम्रता की प्रेम कहानी है। विश्वविद्यालय में दोनों के बीच प्रेम पनपता है, लेकिन परिस्थितियां उन्हें अलग कर देती हैं। वर्षों बाद नाटकीय परिस्थितियों में दोनों फिर मिलते हैं और विवाह के बंधन में बंध जाते हैं।
‘पूनम का चांद’, ‘कहां गई होगी नताशा?’ और ‘उस द्वीप पर’ में रिश्तों की संवेदनाएं, अनकही पीड़ा और खोए हुए प्रेम की गाथा देखने को मिलती है। पढ़ाई, कॉलेज और विश्वविद्यालय का परिवेश भी इन कहानियों में प्रमुखता से उभरता है।
‘अधिवास’ कहानी रहस्य और रोमांच से भरपूर है। मुंबई के खार स्थित एक बड़े बंगले में रहने वाले रायकर परिवार के पालतू कुत्ते अचानक गायब होने लगते हैं। बाद में उनकी बेटी मुग्धा भी लापता हो जाती है। सीसीटीवी फुटेज से एक रहस्यमयी पेड़ का सच सामने आता है। कहानी का यह अनोखा घटनाक्रम पाठकों को अंत तक बांधे रखता है।
‘सलाम डॉक्टर कुणाल!’ मेहनत और सफलता का संदेश देती है, जबकि ‘शुद्धिकरण’ मन और शरीर की शुद्धता के अनुभव को सामने लाती है। ‘यह और वह’ अंगदान की मानवीय संवेदना को छूती है। ‘नियति’ बॉलीवुड की पृष्ठभूमि में जिंदगी के अनिश्चित मोड़ों को रेखांकित करती है।
‘भिन्न’ प्रेम और विपरीत व्यक्तित्वों के आकर्षण की कहानी है। ‘पीड़ादायी संतान अभिभावक संघ’ रिश्तों के उतार-चढ़ाव को सामने लाती है। ‘बेबसी’ में असल्फा विलेज की झोपड़पट्टी में रहने वाली शांताबाई की त्रासदी है, जबकि ‘माफी’ रिश्तों की मार्मिकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।
शीर्षक कहानी ‘दस्तखत की मुहर’ प्रशासनिक व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करती है। एक शिक्षण संस्थान में सांस्कृतिक प्रमुख की जिम्मेदारी मिलने के बाद सहयोग और समर्थन के अभाव में सामने आने वाली परेशानियों को कहानी संवेदनशीलता से रेखांकित करती है।
लेखिका ने लिखा है, ‘देखी, सुनी, महसूस हुई घटनाओं की परिणति हैं ये कहानियां।’ यह कथन संग्रह की मूल भावना को सटीक रूप से व्यक्त करता है। डॉ. गोरख थोरात का अनुवाद सहज और प्रभावी है।
प्रकाशक: माय मिरर पब्लिशिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड, पुणे
पृष्ठ: 192 | मूल्य: 250 रुपए
