▪️सूर्यकांत उपाध्याय

30 दिसंबर की रात मोहन अपनी पत्नी अर्पणा के साथ एक दोस्त के यहां हुई नए साल की पार्टी से लौट रहा था। बाहर कड़ाके की ठंड थी।
दोनों पति-पत्नी कार से घर की ओर जा रहे थे। तभी मोहन की नजर सड़क किनारे पेड़ के नीचे पतली, पुरानी और फटी चादर में लिपटे एक बुजुर्ग भिखारी पर पड़ी। उसे ठंड से कांपता देखकर मोहन का दिल द्रवित हो गया। उसने कार रोक दी।
अर्पणा ने हैरानी से पूछा, ‘क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी?’
मोहन ने कहा, ‘वह बुजुर्ग ठंड से कांप रहा है। गाड़ी में जो कंबल रखा है, वह उसे दे देते हैं।’
अर्पणा बोली, ‘क्या? इतना महंगा कंबल आप इसे देंगे? अरे, यह उसे ओढ़ेगा नहीं, बल्कि बेच देगा। ये लोग ऐसे ही होते हैं।’
मोहन मुस्कुराया, कार से उतरा और डिक्की से कंबल निकालकर बुजुर्ग को दे दिया। अर्पणा ने नाराजगी में मुंह बना लिया।
अगले दिन, यानी 31 दिसंबर को भी कड़ाके की ठंड थी। एक कार्यक्रम से लौटते समय अर्पणा ने कहा, ‘चलिए, एक बार देखते हैं कि उस रात वाले बुजुर्ग का क्या हाल है।’
मोहन ने वहीं कार रोकी। बुजुर्ग वहीं था, लेकिन उसके पास वह कंबल नहीं था। वह अपनी पुरानी चादर ओढ़े लेटा था।
अर्पणा ने कहा, ‘देखा! मैंने कहा था न कि कंबल मत दो। उसने जरूर बेच दिया होगा।’
दोनों उसके पास गए। अर्पणा ने व्यंग्य से पूछा, ‘क्यों बाबा, रात वाला कंबल कहां है? बेचकर नशे का सामान ले आए क्या?’
बुजुर्ग ने कुछ दूरी पर लेटी एक बूढ़ी महिला की ओर इशारा किया। उसने वही कंबल ओढ़ रखा था।
बुजुर्ग बोला, ‘बेटा, यह महिला पैरों से विकलांग है। उसके कपड़े भी जगह-जगह से फटे हैं। लोग भीख देते समय भी उसे गंदी नजरों से देखते हैं। ऊपर से इतनी ठंड… मेरे पास कम से कम यह पुरानी चादर तो थी, लेकिन उसके पास कुछ नहीं था। इसलिए मैंने कंबल उसे दे दिया।’
अर्पणा की आंखों में पश्चाताप के आंसू आ गए। वह धीरे से मोहन से बोली, ‘चलिए, घर से एक कंबल और लाकर बाबा को दे देते हैं।’
‘चिड़िया चोंच भर ले गई, नदी न घटे नीर।
दान दिए धन ना घटे, कह गए दास कबीर।’
