▪️ ‘रसराज’ द्वारा तुलसी जयंती का आयोजन
- मुंबई। साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘रसराज’ द्वारा आर्य समाज, गोरेगांव में तुलसी जयंती के अवसर पर परिसंवाद और कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।

‘रामचरितमानस में सामाजिक चेतना’ विषय पर अपने विचार रखते हुए प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने तुलसी-काव्य के आमजन तक पहुंचने को कवि की सबसे बड़ी विशेषता बताया। उन्होंने कहा कि आज के जनवादियों को आम पाठक नहीं जानता, लेकिन तुलसी का पाठक कवि से अधिक उनके राम को जानता है, जो बृहत्तर समाज के लिए उदात्त मूल्यों के पुंज हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि केवट, निषाद तथा वानर-भालुओं जैसे उपेक्षितों की पीड़ा के चितेरे तुलसीदास की लोकप्रियता भविष्य में भी बढ़ती जाएगी।
‘रामचरितमानस में गुरु महिमा’ विषय पर बोलते हुए रासबिहारी पाण्डेय ने कहा कि मानस के चार घाटों पर बैठे चारों वक्ताओं -भगवान शंकर, याज्ञवल्क्य, कागभुशुंडि और तुलसीदास ने बार-बार गुरु की महिमा का बखान किया है। भगवान राम जीवन के किसी भी प्रसंग में गुरु से विमर्श किए बिना आगे नहीं बढ़ते। वर्तमान समय में मानस से सबक लेकर गुरु की गरिमा की पुनर्स्थापना की आवश्यकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ अभिनेता पं. विष्णु शर्मा ने कहा कि तुलसीदास क्रांतिकारी कवि थे। लाभ और लोभ का प्रलोभन देकर अकबर द्वारा धर्मांतरण के लिए चलाया गया ‘दीन-ए-इलाही’ इसलिए सफल नहीं हो पाया, क्योंकि उसी समय तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से हिंदुओं में नवजागरण का बिगुल बजा दिया था। हिंदू एकता को बल देने के लिए तुलसीदास ने जगह-जगह रामलीलाओं की शुरुआत कराई और हनुमान जी की मूर्तियों के साथ कुश्ती वाले अखाड़ों की स्थापना कराई।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में वागीश सारस्वत, अर्चना जौहरी, ओमप्रकाश तिवारी, अंबिका झा, अनिल गौड़, जवाहर लाल निर्झर, अर्चना झा, हीरालाल यादव, कमर हाजीपुरी, अर्चना वर्मा सिंह, अरुण दुबे, राम सिंह, रुस्तम घायल, मंजुला जगतरामका और देबोस्मिता घोषाल आदि ने अपनी रचनाएं सुनाईं और तुलसी साहित्य पर अपने विचार प्रकट किए।
