▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक गाँव में शिवराम नाम का एक नास्तिक रहता था। वह भगवान के नाम से ही चिढ़ता था और किसी आस्तिक से बात करना भी पाप समझता था। एक बार गाँव में एक महात्मा प्रवचन देने आए। कई दिनों तक उनके प्रवचन चलते रहे, लेकिन शिवराम वहाँ कभी नहीं गया।
एक दिन खेत से लौटते समय महात्मा की आवाज उसके कानों में पड़ी। वे कह रहे थे, ‘यदि जीवन में सफल होना चाहते हो तो मन में दृढ़ संकल्प करो और पूरी निष्ठा से उसे पूरा करने में लग जाओ। एक दिन उसका सुफल अवश्य मिलेगा।’
ये शब्द शिवराम के मन में बस गए। उसने महात्मा की बात को गलत साबित करने के लिए एक ऐसा संकल्प करने का निश्चय किया, जिसका कोई लाभ न हो। बहुत सोचने के बाद उसने तय किया कि वह प्रतिदिन अपने पड़ोसी कुम्हार का चेहरा देखे बिना भोजन नहीं करेगा।
अगले दिन से वह सुबह-सुबह घर के बाहर बैठकर कुम्हार के बाहर आने का इंतजार करने लगा। कभी कुम्हार गाँव से बाहर चला जाता तो शिवराम को उपवास करना पड़ता। फिर भी वह अपने संकल्प पर अडिग रहा। छह महीने बीत गए, लेकिन उसे कोई लाभ नहीं हुआ।
एक दिन शिवराम देर से उठा। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने गाँव के बाहर खदान में जा चुका था। अपने संकल्प के कारण शिवराम भी वहाँ पहुँच गया। उसने कुम्हार को मिट्टी खोदते देखा और लौटने लगा। तभी कुम्हार को मिट्टी के नीचे सोने की चार ईंटें मिलीं। उसने शिवराम को जाते देखा और घबरा गया। उसे लगा कि शिवराम ने सोना देख लिया है और राजा से शिकायत कर देगा।
कुम्हार ने उसे रोककर कहा, ‘भाई, देख लिया है तो आधा सोना तुम ले जाओ, लेकिन राजा से शिकायत मत करना।’ शिवराम को जब सारा रहस्य पता चला तो वह चकित रह गया। उसने दो ईंटें ले लीं।
उसे महात्मा के शब्दों की सत्यता समझ में आ गई। उसने वह धन गाँव के हित में लगा दिया और शेष जीवन तप एवं भगवद्भक्ति में बिताने का संकल्प किया। संकल्प के इसी प्रभाव से वही नास्तिक शिवराम आगे चलकर महान तपस्वी और परम आस्तिक के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
