▪️ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

कुसुम लता सिंह बेहद सक्रिय लेखिका, साहित्यकार, संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। जनजातीय चेतना, कला, साहित्य, संस्कृति एवं समाचार की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ की प्रकाशक एवं संपादक कुसुम लता सिंह वर्तमान में चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट के हिंदी विभाग से संबद्ध हैं। उन्होंने बाल एवं किशोर साहित्य में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। विभिन्न साहित्यकारों की सृजनशीलता के संपादन और संचयन में भी उनका कोई सानी नहीं है।
उनकी नवीनतम पुस्तक ‘गोंड आदिवासी लोक और चित्रकला’ जनजातीय कलाकारों की प्राकृतिक प्रतिभा को रचनात्मक मंच देने का प्रयास है। इसमें लेखिका की मूल चिंता यह है कि विकास की भागमभाग में हम जिस तरह महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों यानी जल, जंगल और जमीन का शोषण कर रहे हैं, उसके चलते हमारी पारंपरिक कलाएं सुरक्षित नहीं रह पाएंगी।
पुस्तक में प्रस्तावना ‘अतीत से वर्तमान तक गोंड कला की सृजनशील पगडंडी पर चलते हुए’ समेत सात अध्याय हैं। इनमें ‘गोंड आदिवासी लोक का संक्षिप्त इतिहास’, ‘गोंड चित्रकला’, ‘गोंड चित्रकला में प्रयोग किए जाने वाले रंग’, ‘गोंड चित्रकला की परंपरा और प्रयोग’, ‘गोंड कलाकार : प्रयोग और परिदृश्य’, ‘गोंड कलाकार’ तथा ‘आदिवासी चित्रकला की प्राचीनता का भविष्य’ शामिल हैं।
छठे अध्याय में पद्मश्री दुर्गाबाई व्याम, सुभाष व्याम, मानसिंह व्याम, मिथिलेश श्याम, रोशनी श्याम, दिलीप श्याम, किशन उइके, राधेश्याम खेरवाल, कुंती मारावी, गरिमा टेकाम, कमली कुशराम, द्वारका परास्ते, परसाद सिंह कुसराम, संतू टेकाम, यशवंत धुर्वे, पुरुषोत्तम टेकाम, रामसिंह उरवेती, टामसी राम परास्ते, अनीता श्याम, विजय कुमार श्याम, मोहन सिंह श्याम, धनिया श्याम, सुखराम विश्वकर्मा, अनसुइया श्याम उइके और गायत्री मारावी जैसे कलाकारों का परिचय और उनकी कला पर चर्चा की गई है।
इसके साथ ही ‘और अंत में’ शीर्षक के तहत लेखिका का निष्कर्ष है कि इन सभी गोंड कलाकारों ने कला संबंधी कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है। यह गुण उन्हें विरासत में मिला है और इसकी प्रेरणा उन्हें अपने समुदाय, घर-परिवार, आसपास के लोगों या मित्रों से मिली है। ये कलाकार परंपरा और प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता में विश्वास करते हैं। गोंड कला के चित्रांकन में कलाकारों की कल्पनाशक्ति असीम है। इसलिए कहा जाता है कि गोंड कला केवल पेंटिंग नहीं, बल्कि एक एहसास है, जिसमें लोक संगीत की स्वर लहरियां और प्रकृति की पुकार सुनाई देती है।
साहित्यकार ममता कालिया के अनुसार, ‘यह पुस्तक ‘गोंड आदिवासी लोक और चित्रकला’ महज ड्राइंगरूम में बैठकर लिखा गया कलावादी आख्यान नहीं है, वरन् लेखिका के लंबे अध्ययन और आदिवासी जनजातियों की पारंपरिक कलाओं का विस्तृत आकलन करने का परिणाम है। पच्चीस गोंड कलाकारों से प्रत्यक्ष संवाद में कुसुम लता सिंह की रचनात्मक तैयारी, जिज्ञासा और सराहना का कदम-कदम पर परिचय मिलता है। लेखिका अपने शोध में यह तथ्य तनिक नहीं भूलतीं कि सबसे पहले महान चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन ने गोंड कला के विकास पर ध्यान दिया। उन्होंने युवा जनगढ़ सिंह श्याम को मिट्टी की दीवार पर चित्रकारी करते देखा और उसके चित्रों से प्रभावित होकर उसे अपने साथ घर ले आए। गोंड समुदाय में अपनी लोक कला के लिए रचनात्मक गौरव जगदीश स्वामीनाथन ने जगाया और इससे एक सुप्त-लुप्त पड़ी हुई कला-परंपरा की आंख खुली। जनजातीय कलाओं को आप यूं ही खारिज नहीं कर सकते। उनके द्वारा खींची गई हर बिंदु और रेखा का सांस्कृतिक महत्व है।’
पुस्तक में विषयानुकूल चित्र दिए गए हैं। इससे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। लेखिका ने मनोयोग से सभी कलाकारों से वार्तालाप किया और उनकी रचनात्मक प्रतिभा को इस पुस्तक में स्थान दिया है। हकीकत तो यह है कि जनजातीय विषयों पर अमूमन साहित्यकारों की नजर कम ही पड़ती है, लेकिन कुसुम लता सिंह ने इस कार्य को एक अनुष्ठान की तरह पूरा किया है। इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।
लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली ने इस पुस्तक का प्रकाशन किया है। आवरण, साज-सज्जा और मुद्रण बेहतरीन है। 116 पृष्ठों की इस हार्डबाउंड कृति का मूल्य 495 रुपए है।
