▪️सूर्यकांत उपाध्याय

वृंदावन में एक ऐसे निष्काम भक्त रहते थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन श्री राधा-कृष्ण के नाम में समर्पित कर दिया था। न कोई इच्छा, न कोई शिकायत और न ही भगवान से कभी कुछ माँगा। उनके लिए प्रभु का नाम ही सब कुछ था।
एक दिन वे बाँके बिहारी जी के दर्शन करने मंदिर पहुँचे। जैसे ही उन्होंने गर्भगृह की ओर देखा, उनके होश उड़ गए। सिंहासन तो था, लेकिन उन्हें बाँके बिहारी जी दिखाई नहीं दिए! आसपास के भक्तों ने कहा, “बाबा, प्रभु तो सामने विराजमान हैं।”
भक्त का हृदय टूट गया। वे सोचने लगे-“शायद मेरे पाप इतने बढ़ गए हैं कि अब मेरे बिहारी जी ने भी मुझसे मुँह मोड़ लिया।” आँखों से आँसू बहने लगे। वे व्याकुल होकर यमुना तट की ओर चल पड़े और जीवन समाप्त करने का निर्णय कर लिया।
अपने प्रिय भक्त की यह दशा बाँके बिहारी जी से देखी न गई। उन्होंने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और एक असहाय कोढ़ी से कहा कि उस भक्त का आशीर्वाद उसे रोगमुक्त कर सकता है।
कोढ़ी दौड़कर भक्त के चरणों में गिर पड़ा। बहुत विनती करने पर भक्त ने काँपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “भगवान तुम्हारी इच्छा पूरी करें।”
क्षणभर में कोढ़ी का रोग मिट गया और उसका शरीर निर्मल हो उठा। तभी दिव्य प्रकाश के बीच स्वयं बाँके बिहारी जी प्रकट हो गए।
भक्त रोते हुए प्रभु के चरणों में गिर पड़े-“प्रभु! आज दर्शन क्यों दिए?”
भगवान ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और बोले, “हे भक्त! तुमने जीवनभर मुझसे कुछ नहीं माँगा। तुम्हारी निष्काम भक्ति का ऋण मेरे ऊपर चढ़ता गया। मैं तुम्हारा कर्जदार हो गया था। आज तुमने अपने पुण्य का थोड़ा-सा फल किसी और के लिए माँग लिया, मेरा ऋण कुछ कम हुआ और मैं तुम्हारे सामने आ सका।”
यह सुनकर भक्त की आँखों से प्रेम के आँसू बह निकले।
सच्ची भक्ति वह है, जहाँ भक्त कुछ माँगता नहीं और भगवान स्वयं उसके प्रेम के कर्जदार हो जाते हैं।
