▪️सूर्यकांत उपाध्याय

घने जंगल में एक संत अपनी छोटी-सी कुटिया बनाकर रहते थे। एक किरात (शिकारी) रोज़ उस रास्ते से गुजरता और संत को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके आगे बढ़ जाता।
एक दिन उसने संत से पूछा, “बाबा! मैं तो जंगल में मृग का शिकार करता हूँ, लेकिन आप यहाँ किसका शिकार करने बैठे हैं?”
संत की आँखों से आँसू छलक पड़े। वे बोले, “मैं श्रीकृष्ण का शिकार करने बैठा हूँ।”
किरात भोलेपन से बोला, “बाबा, रोते क्यों हो? मुझे बताओ, तुम्हारा कृष्ण दिखता कैसा है? मैं उसे पकड़कर तुम्हारे पास ले आऊँगा।”
संत ने श्रीकृष्ण के मनोहारी स्वरूप का वर्णन किया – “वह सांवला-सलोना है, सिर पर मोरपंख धारण करता है और हाथों में बांसुरी रहती है।”
किरात ने दृढ़ निश्चय कर लिया, “जब तक आपका शिकार पकड़कर नहीं लाऊँगा, तब तक अन्न तो दूर, पानी भी नहीं पीऊँगा।”
वह जंगल में जाल बिछाकर बैठ गया। एक दिन बीता, फिर दूसरा और तीसरा भी। उसकी सरलता, विश्वास और संत के प्रति निष्कपट प्रेम देखकर दयालु श्रीकृष्ण का हृदय पिघल गया। वे बांसुरी बजाते हुए स्वयं आए और जाल में फँस गए।
किरात ने जब उस सांवले-सलोने बालक को देखा तो उसकी आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगे। फिर उसे संत का स्मरण हुआ। वह खुशी से पुकार उठा, “बाबा! शिकार मिल गया… शिकार मिल गया!”
वह श्रीकृष्ण को अपने कंधे पर बैठाकर संत के पास ले आया।
संत ने जब यह अद्भुत दृश्य देखा तो उनके होश उड़ गए। वे किरात के चरणों में गिर पड़े और बोले, “हे प्रभु! मैंने आपको पाने के लिए वर्षों तप किया, भजन किया, घर-बार छोड़ा… फिर भी आप नहीं मिले। और यह भोला किरात आपको केवल तीन दिन में पा गया!”
भगवान मुस्कुराए और बोले, “इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम और मेरे प्रति अटूट विश्वास मुझे इसके पास खींच लाया।”
सच ही है, भगवान ज्ञान से नहीं, निष्कपट प्रेम और विश्वास से बंधते हैं। और जिस पर संत की कृपा हो जाए, उसके लिए प्रभु तक पहुँचने का मार्ग स्वयं सरल हो जाता है।
संतों को किया गया एक सच्चा प्रणाम भी कभी व्यर्थ नहीं जाता।
