▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

मुंबई स्टेशन पर एक अजनबी ने एक यात्री से कहा – “भाई, इस बक्से को जरा देखना, मैं अभी आता हूँ।” ट्रेन चल पड़ी। एक-एक करके कई स्टेशन गुजर गए, मगर वह व्यक्ति नहीं लौटा। आखिर ट्रेन चेन्नई पहुँची। यात्री ने सोचा – “अब तो यह बक्सा मेरा ही समझो, इसे भी साथ ले चलता हूँ।”
कुली से बक्सा उठवाया तो लगेज वालों ने पूछा – “यह किसका सामान है?” यात्री ने कहा – “मेरा है।”
कस्टम वालों ने पूछा – “बक्से में क्या है?”
“पता नहीं, चाबी खो गई है।” ताला तोड़ा गया तो अंदर से लाश निकली!
अब यात्री लाख कहता रहा – “यह मेरा नहीं है”, लेकिन उसके अपने शब्द ही उसके गले का फंदा बन चुके थे।
यही हमारे जीवन की कहानी है। हम दिन-रात कहते हैं – मेरा घर, मेरा धन, मेरी गाड़ी, मेरी जमीन, मेरे रिश्ते, मेरी प्रतिष्ठा… और इसी “मेरा-मेरा” में मोह, अहंकार और बंधन बढ़ते जाते हैं।
जिस चीज को हम अपना समझकर पकड़ते हैं, वही एक दिन हमें पकड़ लेती है। धन छूट जाता है, घर छूट जाता है, शरीर छूट जाता है – फिर हमारा वास्तव में है क्या?
सच तो यह है कि देह भी उसकी, सांस भी उसकी, शक्ति भी उसकी और यह सम्पूर्ण संसार भी उसी का है। हम तो केवल कुछ समय के लिए उसके दिए हुए साधनों के यात्री हैं।
इसलिए “मेरा” का बोझ छोड़कर “तेरा” का भाव अपनाइए।
“मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।”
