▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक राजा शिकार करते समय रास्ता भटककर घने जंगल में जा पहुँचा। रात होने पर हिंसक पशुओं की आवाजों से वह भयभीत हो गया। दूर एक झोपड़ी में दीपक जलता दिखाई दिया। राजा वहाँ पहुँचा और स्वयं को राह भूला पथिक बताकर रात बिताने के लिए आश्रय माँगा।
उदार हृदय वनवासी ने उसे भोजन कराया और अपनी चारपाई पर सुलाकर स्वयं जमीन पर सो गया। सुबह उसने राजा को सही रास्ते तक पहुँचाने में भी सहायता की। वनवासी के आतिथ्य से प्रसन्न राजा ने उसे अपना परिचय दिया और उपहारस्वरूप अपने विशाल चंदन उद्यान का स्वामी बना दिया।
वनवासी लकड़ी का कोयला बनाकर बेचता था। उसने सोचा कि चंदन के पेड़ों से भी कोयला बनाकर अधिक कमाई की जा सकती है। वह पेड़ों को काटकर कोयला बनाने लगा और अच्छी आमदनी से सुख-सुविधाओं का जीवन जीने लगा। उसे यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कितनी मूल्यवान संपत्ति नष्ट कर रहा है।
दो वर्षों में उसने लगभग पूरा चंदन उद्यान कोयले में बदल दिया। केवल एक पेड़ बचा था। एक दिन वर्षा के कारण कोयला नहीं बन सका, तो उसने उसी पेड़ की एक डाली काटकर बाजार में बेचने का निर्णय लिया। लकड़ी से आती सुगंध पहचानकर खरीदारों ने उसे चंदन बताया और कोयले की तुलना में दस गुना अधिक कीमत दी।
यह जानकर वनवासी पछताने लगा। उसे समझ आया कि यदि वह चंदन की लकड़ी बेचता, तो अपार संपत्ति अर्जित कर सकता था। मगर अब पूरा उद्यान नष्ट हो चुका था। बुढ़ापे में उसके पास पछताने के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा।
• शिक्षा: मनुष्य का जीवन चंदन के उद्यान के समान अमूल्य है। जो समय और सामर्थ्य का सदुपयोग करते हैं, वे जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। जो इन्हें लापरवाही से गँवाते हैं, उन्हें अंत में वनवासी की तरह पछताना पड़ता है।
