
▪️मुंबई
देशभर में दशहरे पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला जिले के सांगोला गांव में विजयादशमी पर रावण का दहन नहीं, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। करीब 213 साल पुरानी यह परंपरा आज भी ग्रामीणों की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
अकोला जिले के बालापुर तालुका में स्थित सांगोला गांव में रावण की दस सिरों वाली प्रतिमा स्थापित है। यहां रावण को उसकी विद्वता, तपस्या और वेदों के ज्ञान के लिए सम्मान दिया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि रावण के व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलुओं को भी समझना जरूरी है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, करीब दो शताब्दी पहले एक ऋषि की प्रेरणा से इस परंपरा की शुरुआत हुई थी। बाद में रावण की प्रतिमा स्थापित होने के बाद ग्रामीणों ने उसे लंकेश्वर के रूप में स्वीकार कर लिया। तभी से दशहरे पर यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
जहां देश के अधिकांश हिस्सों में रावण दहन दशहरे का प्रमुख आकर्षण होता है, वहीं सांगोला की यह परंपरा अलग धार्मिक मान्यता और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। यहां के ग्रामीण आज भी इस अनूठी परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं।
