▪️सूर्यकांत उपाध्याय

पहले बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी कारों में भी स्टेपनी की जरूरत पड़ती थी। आज बात कार की नहीं, जिंदगी की गाड़ी और रिश्तों की स्टेपनी की है।
कल मुझे पता चला कि दिल्ली में रहने वाली मेरी एक परिचित की तबीयत खराब है। मैं उनसे मिलने पहुंचा। वह कमरे में अकेली बिस्तर पर पड़ी थीं और घर में मौजूद नौकरानी आराम से टीवी देख रही थी। मुझे देखकर परिचित उठने की कोशिश करने लगीं। सहारा देकर उन्हें बैठाया, तो वह बिलख पड़ीं। कहने लगीं, ‘बेटा, अब अकेलापन बहुत सताता है। कोई मिलने भी नहीं आता। मौत भी नहीं आती। अकेले पड़े-पड़े थक गई हूं।’
उनके पति ऊंचे सरकारी अधिकारी थे। उनके रहते जिंदगी की गाड़ी तेज रफ्तार से दौड़ती रही। कई मकानों, दुकानों और शेयरों में निवेश किया, लेकिन रिश्तों में नहीं। रिश्तेदारों को तुच्छ समझा। इकलौता बेटा पढ़ाई के लिए अमेरिका चला गया। पति के निधन के बाद वह अकेली रह गईं। अब देखभाल के लिए नौकरानी थी, लेकिन वह रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकी।
गाड़ी छोटी हो या महंगी, अतिरिक्त टायर जरूरी है। पंचर होने पर स्टेपनी ही काम आती है। इसी तरह जिंदगी में सुख-दुख के समय अपने लोगों का साथ अनमोल होता है। धन-दौलत सुविधाएं दे सकती है, अकेलेपन का सहारा नहीं बन सकती।
पश्चिमी देशों में सामाजिक सुरक्षा के सहारे अकेले जीवन बिताना कुछ आसान हो सकता है, लेकिन हमारे यहां परिवार और रिश्तों का महत्व कहीं अधिक है। इसलिए अपनी जिंदगी की डिक्की में झांककर देखिए कि रिश्तों की स्टेपनी है या नहीं। है, तो उसमें प्रेम और अपनापन कितना बचा है।
याद रखिए, डोनट टायर कुछ दूर तक ही साथ देता है। पूरा सफर तय करने के लिए पूरे पहिए की जरूरत होती है। उसी तरह सच्चे रिश्ते निभाने के लिए झुकना, सहना और कभी-कभी अपनी हार स्वीकार करना पड़ता है।
सच्चे संबंध ही जीवन की वास्तविक पूंजी हैं।
