▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक गांव में एक बुजुर्ग शिक्षक रहते थे। वे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें जीवन की अच्छी बातें भी सिखाते थे। एक दिन उन्होंने अपने विद्यार्थियों को एक अंधेरे कमरे में ले जाकर पूछा, “बताओ, इस अंधेरे को दूर करने के लिए क्या करना होगा?”
एक विद्यार्थी बोला, “गुरुजी, हमें इस कमरे की दीवारों को तोड़कर खिड़कियां बनानी होंगी, ताकि बाहर की रोशनी अंदर आ सके।” दूसरे ने कहा, “हमें कमरे की सफाई करके इसे सुंदर बनाना चाहिए।” तीसरे विद्यार्थी ने सुझाव दिया, “हमें सुबह तक इंतजार करना चाहिए, सूरज निकलेगा तो अंधेरा अपने आप दूर हो जाएगा।”
शिक्षक ने सभी की बातें ध्यान से सुनीं। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा-सा दीपक निकाला और उसे जला दिया। देखते ही देखते कमरे का अंधेरा कम होने लगा।
शिक्षक मुस्कराए और बोले, “बच्चो, अंधेरे को दूर करने के लिए हमेशा बड़े बदलाव या लंबे इंतजार की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक छोटा-सा दीपक भी पर्याप्त होता है। इसी तरह जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए भी हमें दूसरों के बदलने या परिस्थितियां अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें अपनी ओर से छोटा-सा प्रयास शुरू कर देना चाहिए।”
उनकी बात सुनकर सभी विद्यार्थी समझ गए कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है।
समय बीतने के साथ उन विद्यार्थियों ने इस सीख को अपने जीवन में उतारा। किसी ने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, किसी ने गांव की सफाई का बीड़ा उठाया, तो किसी ने जरूरतमंदों की सहायता करनी शुरू कर दी। उनके छोटे-छोटे प्रयासों से पूरे गांव में सकारात्मक बदलाव आने लगा।
• सीख: जीवन में बड़ा बदलाव लाने के लिए बड़े साधनों की नहीं, बल्कि सही सोच और छोटी-छोटी कोशिशों की जरूरत होती है। इसलिए परिस्थितियों को कोसने के बजाय अपने हिस्से का दीपक जलाइए।
