▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

• सुरेश मिश्र देश के जाने-माने हास्य-व्यंग्य कवि, गीतकार, मंच संचालक और साहित्यकार हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘प्रदूषण है खरदूषण’, ‘सावनी बयार’, ‘जय गणेश’, ‘संकल्प’, ‘ज्योति जलाएं’ तथा ‘दोहे श्रृंगार के’ शामिल हैं। उन्हें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की ओर से ‘साने गुरुजी राष्ट्रीय एकता जीवन गौरव पुरस्कार-राज्य स्तरीय’ से सम्मानित किया जा चुका है।
‘डमरू शतक’ डमरू छंदों का पहला काव्य संग्रह है। उल्लेखनीय है कि डमरू छंद को मात्राविहीन छंद माना जाता है। यह घनाक्षरी छंद का ही एक प्रकार है। डमरू छंद में ह्रस्व ‘अ’ को छोड़कर किसी अन्य स्वर या मात्रा का प्रयोग नहीं होता है।
- ‘डमरू शतक’ का पहला छंद देखिए-
‘सरस्वती वंदना’
धवल बसन तन चढ़त धवल खग, जग भर नमन करत तव पग-पग। पग-पग समझ सतत परसत मन, मलयज करत सकल धन यह जग। यह जग लखत बजत कब झन-झन, सब तम हरत बनत सतजन नग। नग, अनपढ़, सब बनत समझ घर, बरद, बरस जस बरसत जल ढग।
डमरू छंद का सृजन कठिन माना जाता है। यही वजह है कि अब तक हिंदी साहित्य के इतिहास में केवल डमरू छंदों का कोई बड़ा संग्रह सामने नहीं आया था। कवि सुरेश मिश्र ने ‘डमरू शतक’ के माध्यम से साहित्य जगत की इस कमी को पूरा किया है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

कवि का कहना है कि भगवान शिव की रुद्राक्ष माला में कुल 108 मनके होते हैं। इसी भाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ‘डमरू शतक’ में 108 छंदों की माला पिरोई है। इस कृति को आद्योपांत पढ़ने से यह विश्वास होता है कि साहित्य सृजन में डमरू छंद वास्तव में कठिन साधना और दुष्कर तपस्या के समान है। कवि ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को बेहद कुशलता से संपन्न किया है।
- ऐसा माना जाता है कि इस छंद का उपयोग केवल ईश्वर की आराधना के लिए किया जाना चाहिए। हालांकि, कवि सुरेश मिश्र नई परंपराएं स्थापित करने में माहिर हैं। इसलिए उन्होंने ‘डमरू शतक’ में ईश्वर वंदना के साथ-साथ मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों को भी स्थान दिया है। इसका उदाहरण ‘परिवहन नियम’ शीर्षक का छंद है-
सभल-सभल कर चल पथ पर नर, जब घर तज तब कवच पहन सर। सर पर चढ़ मत समय लखत सब, सड़क कहत चल हरदम बचकर। बचकर गमन बचत जग हर पल, अरब-खरब जन मरत पलट कर। कर न मलय सम हर पथ यम दल, लखत जनक, धन, तनय सतत घर।
- पर्यावरण संरक्षण की पैरवी करते हुए ‘पेड़ मत काटो’ शीर्षक से कवि लिखते हैं-
वन जब कटत चलत गम परसत, तन मन वतन पवन सब बहकत। बहकत जलद बरस जल असमय, हलधर नयन बहत सब हसरत। हसरत जरत फसल कब हरसत, सहत रहत पग-पग पर अखरत। अखरत जगत करत खल नरतन, थल पर सकल नयन जल बरसत।
142 पृष्ठों की इस हार्डबाउंड पुस्तक का मूल्य 299 रुपए है। इसे मुंबई के प्रतीक पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है। पुस्तक की साज-सज्जा और छपाई उत्कृष्ट है। डमरू छंद के प्रेमियों के लिए यह पुस्तक एक अमूल्य उपहार है।
