▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक पंडितजी के प्रवचन दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। एक दिन उन्हें पास के गांव के मंदिर में पुजारी नियुक्त किया गया। गांव जाने के लिए वे बस में सवार हुए और कंडक्टर को किराया दिया। पैसे लौटाते समय कंडक्टर ने उन्हें 50 रुपए अधिक दे दिए।
पंडितजी ने अतिरिक्त रुपए रख लिए। उनके मन में विचार आया कि कंडक्टर अपना पैसा लेने जरूर आएगा, लेकिन पांच मिनट बीत जाने के बाद भी वह नहीं आया। तब उनके मन में दूसरा विचार आया कि बस मालिक तो लाखों रुपए कमाता है। यदि मैं 50 रुपए रख भी लूं, तो क्या फर्क पड़ेगा?
कुछ देर बाद गांव आ गया। पंडितजी बस से उतर तो गए, लेकिन उनका मन नहीं माना। वे वापस कंडक्टर के पास पहुंचे और 50 रुपए लौटाते हुए बोले, ‘किराया लौटाते समय आपने मुझे 50 रुपए अधिक दे दिए थे।’
यह सुनकर कंडक्टर ने पूछा, ‘क्या आप ही इस गांव के मंदिर के नए पुजारी हैं?’ पंडितजी के हां कहने पर उसने बताया, ‘मैं कई दिनों से आपके प्रवचन सुनना चाहता था। आज आपको बस में देखा, तो मन में विचार आया कि यदि आपको अधिक पैसे दे दूं, तो आप क्या करेंगे? अब मुझे विश्वास हो गया है कि आपके प्रवचन और आपके आचरण में कोई अंतर नहीं है।’
कंडक्टर की बात सुनकर पंडितजी भावुक हो गए। उन्होंने मन ही मन भगवान का धन्यवाद करते हुए कहा, ‘हे प्रभु! आपने मुझे बचा लिया। मैं तो 50 रुपए के लालच में आपकी शिक्षाओं और अपने सिद्धांतों का सौदा करने जा रहा था।’
- सीख: जीवन में हर कदम पर हमारे कर्मों और चरित्र की परीक्षा होती है। दूसरों को उपदेश देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारना। इसलिए हमेशा ईमानदारी और सदाचार का पालन करें।
