■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा – “चल, मंदिर चलते है?”
मैंने पूछा – “किसलिए?”
मित्र बोला – “दर्शन के लिए!”
मैंने कहा – “क्यों? कल ठीक से दर्शन नहीं किया था क्या?”
मित्र बोला – “तू भी क्या इंसान है! दिनभर एक जगह बैठा रहता है पर थोड़ी देर भगवान के दर्शन करने नहीं जा सकता!”
मैंने कहा – “महाशय! चलने में मुझे कोई समस्या नहीं है, किन्तु आप यह मत कहिये कि दर्शन करने चलेगा क्या? यह कहिये कि देखने चलेगा क्या?”
मित्र बोला – “किन्तु दोनों का मतलब एक ही होता है!”
मैंने कहा – “नहीं! दोनों में जमीन आसमान का अंतर है।”
मित्र ने पूछा – “कैसे?”
यही प्रश्न मैं आपसे भी पूछना चाहता हूँ। अक्सर मैंने देखा है, लोग तीर्थयात्रा पर जाते हैं किसलिए? भव्य मंदिर और मूर्तियों को देखने के लिए, ना कि दर्शन के लिए।
अब आप सोच रहे होंगे कि देखने और दर्शन करने में क्या अंतर है।
देखने का मतलब है सामान्य देखना, जो हम दिनभर करते रहते हैं। किन्तु दर्शन का अर्थ है – जो हम देख रहे हैं, उसके पीछे छिपे तत्व और सत्य को समझना।
देखने से मनोरंजन हो सकता है, परिवर्तन नहीं। किन्तु दर्शन से मनोरंजन हो या ना हो, परिवर्तन अवश्यम्भावी है।
अधिकांश लोग मंदिरों में केवल देखने तक सीमित रहते हैं, दर्शन को नहीं समझ पाते। फलतः उन्हें वह लाभ नहीं मिलता जिसका उल्लेख ग्रंथों में है। हमारे शास्त्रों में तीर्थयात्रा के अनेक लाभ बताये गये है, किन्तु लोग तीर्थयात्रा का अर्थ केवल जगह–जगह घूमना और मंदिर–मूर्तियों को देखना ही समझते है। यह मनोरंजन है, दर्शन नहीं।
तो दर्शन क्या है?
दर्शन वह है जो आपके जीवन को बदलने की प्रेरणा दे।
दर्शन वह है जो आपके जीवन का कायाकल्प कर दे।
दर्शन वह है जो आपके भीतर आमूल–चूल परिवर्तन ले आये।
अंग्रेजी में दर्शन का अर्थ है – फिलोसफी, यानी यथार्थ की परख का दृष्टिकोण।
इसी उद्देश्य से हमारे वैदिक साहित्य में षड्दर्शन की रचना की गई, जिनमे जीवन के आवश्यक और यथार्थ तत्वों की व्याख्या की गई है।
यदि आप अब भी सोच रहे है कि दर्शन क्या है, तो इसे जीवन के व्यावहारिक उदाहरण से समझिये।
रामकृष्ण परमहंस के पहले और बाद हजारों लोगों ने दक्षिणेश्वर की काली को देखा, किन्तु किसी को दर्शन नहीं हुआ। क्यों?
क्योंकि रामकृष्ण परमहंस ने केवल काली की मूर्ति को नहीं देखा बल्कि उसके दर्शन को समझा। इसलिए काली ने उन्हें दर्शन दिया।
भगवान श्री राम के मंदिर जाकर उनकी मूर्ति के दर्शन करने का अर्थ है उनके जीवन चरित को समझना और उसे अपने जीवन में उतारना। यही राम का दर्शन है। यदि आप केवल राम की मूर्ति देखते है किन्तु अपने जीवन में कोई परिवर्तन नहीं करते तो आपको दर्शन का कोई लाभ नहीं मिलने वाला।
यदि आप शिवजी का दर्शन करने जाते है और आपके मन में क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष ही है तो फिर दर्शन का क्या लाभ?
यदि आप हनुमानजी का दर्शन करने जाते है और आपका मन पवित्र नहीं है, स्त्रियों के प्रति आपकी दृष्टि गलत है तो हनुमानजी का दर्शन करना व्यर्थ है। सच्चा भक्त वही है जो अभी बच्चे के समान निर्मल है।
तो अब आपके दर्शन का क्या अर्थ है, अवश्य चिंतन करिएगा।
