
● वसई
‘आओ गायें रामकथा घर-घर में’ आध्यात्मिक आंदोलन के प्रवर्तक, मानस के सिद्ध साधक और ओजस्वी वक्ता पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने व्यासपीठ से संबोधित करते हुए कहा कि समस्त सृष्टि मर्यादा में संचालित होती है, किंतु मनुष्य तर्क के मोह में पड़कर अनेक बार अपनी सीमाएं लांघ देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों की ऋचाओं का विश्लेषण तर्क से किया जा सकता है, परंतु भगवान का साक्षात्कार केवल श्रद्धा और अनुभूति से संभव है।
उन्होंने कहा कि जहां गहरा प्रेम होता है, वहां से विदा लेना सहज नहीं होता। भगवान समस्त सृष्टि के स्वामी हैं और धर्ममार्ग पर चलने वाला व्यक्ति हर काल में संतुलित और सुखी रहता है। प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। इस संदर्भ में उन्होंने चक्रवर्ती राजा दशरथ और पितामह भीष्म के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कर्मफल की अनिवार्यता समझाई। उनका कहना था कि जानकर किए गए कर्मों का लेखा तो रखा ही जाता है, अनजाने में हुए कर्म भी परिणाम देते हैं, इसलिए जीवन में सजगता आवश्यक है।
यूजीसी कानून पर आपत्ति व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह कथित समाज-विरोधी प्रावधान सरकार के लिए ‘गले की हड्डी’ सिद्ध हो रहा है। सामान्य वर्ग को प्रलोभन से प्रभावित किया जा सकता है, पर प्रतिभाशाली समाज को नहीं। इस विषय पर राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी पर भी उन्होंने प्रश्न उठाए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा के साथ बच्चों को रामकथा और सांस्कृतिक मूल्यों के संस्कार मिलना चाहिए। परिवार में बोए गए सद्गुण समय आने पर अवश्य फलित होते हैं। कथा के समापन पर उनके भजनों और भावपूर्ण प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
