■ सूर्यकांत उपाध्याय

कभी-कभी जीवन में अकेलापन हमें अंदर से तोड़ देता है। लेकिन अगर उसी खालीपन को हम भगवान से भर दें तो वही अकेलापन एक सुंदर रिश्ते में बदल जाता है। आज की यह कथा एक ऐसी बूढ़ी माई की है, जिसके जीवन में कोई नहीं था लेकिन भगवान ने स्वयं उसके जीवन में “बेटे” बनकर प्रवेश किया। आइये, उस भक्ति की अमर गाथा सुनते हैं जो भगवान को भी झुका देती है।
एक गाँव में एक बूढ़ी माई रहती थी। उसके न कोई बेटा था, न कोई बेटी, न पति और न कोई रिश्तेदार। अकेली थी, लेकिन भगवान से गहरी आस थी। एक दिन गाँव में एक साधु आया। बूढ़ी माई ने जैसे अपने ही बेटे को देखा हो, वैसे प्रेम से साधु का स्वागत किया, खाना खिलाया, सेवा की।
जब साधु जाने लगा, तो माई ने आँखों में आँसू लिए कहा-“बाबा! मैं बहुत अकेली हूँ… ऐसा आशीर्वाद दो कि मेरा अकेलापन खत्म हो जाए।”
साधु मुस्कराया और अपनी झोली से एक बाल-गोपाल की सुंदर सी मूर्ति निकाल कर बोला – “माई! अब तू अकेली नहीं है। यह तेरा लाल है। इसे अपने बच्चे की तरह पालना।”
माई की दुनिया ही बदल गई। अब उसके जीवन में प्रेम था, ममता थी और भगवान थे। वह मूर्ति को गोद में लेकर लोरी गाती, खिलाती, नहलाती – जैसे सच्चा बच्चा हो। उसका हर दिन प्रेम से भर गया।
एक दिन गाँव के कुछ शरारती बच्चों ने उसे छेड़ते हुए कहा – “मैया! जंगल से भेड़िया आया है! छोटे बच्चों को उठा ले जाता है… अपने लाल को बचा लेना।”
माई ने बच्चों की बात को भी सच मान लिया। उसके लिए बाल-गोपाल सिर्फ मूर्ति नहीं थे, उसका अपना बेटा थे। वो अपने लाल को कुटिया में सुलाकर खुद दरवाजे पर लाठी लेकर बैठ गई और पहरेदारी करने लगी।
एक दिन… दो दिन… तीन दिन… पाँच दिन हो गए…
ना माई सोई, ना खाई, ना कुछ पिया… बस एक ही चिंता – “भेड़िया कहीं मेरे लाल को न ले जाए।”
उस निष्कलंक प्रेम और ममता को देख कर, भगवान श्रीकृष्ण का हृदय पिघल गया।
उन्होंने सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनकर, साक्षात रूप में माई के सामने आकर कहा – “मैया! मैं हूँ तेरा वही बाल-गोपाल! अब तू मेरी गोद में विश्राम कर।”
माई चौक गई! डर के मारे लाठी उठाई और बोली – “चल हट! मेरे लाल को लेने आया है क्या? बहुत देखे हैं तेरे जैसे! मैं अपने लाल के लिए तुझ जैसे हजारों पे न्यौछावर कर दूँ!”
भगवान मुस्कराए., “मैया! मैं त्रिलोकीनाथ हूँ, तुझसे प्रसन्न हूँ, जो चाहे वर मांग ले।”
बुढ़िया बोली – “तो बस यही वर दो, कि मेरे लाल को कभी कोई भेड़िया न ले जाए।”
भगवान भाव-विभोर हो गए। बोले – “मैया, अब मैं तुझे और तेरे लाल को अपने धाम ले चलता हूँ, जहाँ कोई भेड़िया नहीं है।”
और इस तरह ठाकुर जी अपनी भोली भक्त माई को निजधाम ले गए।
शिक्षा: भगवान को पाने के लिए किसी बड़े यज्ञ, तपस्या या विद्वता की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो उस माँ जैसे निष्काम प्रेम और अटूट विश्वास की, जिसने एक मूर्ति को अपना लाल मानकर जीवन अर्पित कर दिया।
