■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक चर्मकार को रात में भगवान ने सपने में दर्शन दिया और कहा कि “कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊंगा।”
चर्मकार की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी सीमित थी। खाना खाने के बर्तन भी बहुत कम थे, फिर भी वह अपनी जिंदगी से खुश रहता था।
वह सच्चा, ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था। इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
सुबह उठते ही चर्मकार ने तैयारी शुरू कर दी। भगवान को चाय पिलाने के लिए वह दूध, चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया। दुकान को अच्छी तरह साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा। उस दिन सुबह से ही भारी बारिश हो रही थी। कुछ देर बाद उसने देखा कि एक सफाई करने वाली महिला बारिश में भीगकर ठिठुर रही है।
चर्मकार को उस पर दया आई और भगवान के लिए लाए गए दूध से उसने उसके लिए चाय बनाकर पिलाई।
दिन बीतने लगा। दोपहर बारह बजे एक महिला अपने बच्चे को लेकर आई और बोली कि बच्चा भूखा है और पीने के लिए दूध चाहिए। चर्मकार ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया। इस तरह शाम के चार बज गए। चर्मकार पूरे दिन बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा।
तभी एक बूढ़ा आदमी, जो चलने में लाचार था, वहां आया और बोला, “मैं भूखा हूं, अगर कुछ खाने को मिल जाए तो मेहरबानी होगी।” चर्मकार ने उसकी लाचारी को समझते हुए मिठाई उसे दे दी। धीरे-धीरे दिन ढल गया और रात हो गई।
रात होते ही चर्मकार के सब्र का बांध टूट गया। भगवान को उलाहना देते हुए वह बोला, “वाह रे भगवान! सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में, लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था?”
तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा, “मैं आज तेरे पास एक बार नहीं, तीन बार आया था। और तीनों बार तेरी सेवा देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। तू मेरी परीक्षा में पास हुआ, क्योंकि तेरे मन का परोपकार और त्याग सामान्य मानव की सीमाओं से परे है।”
शिक्षा: मजबूर या जरूरतमंद व्यक्ति की अवश्य मदद करनी चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’। जरूरतमंद और लाचार लोग धरती पर भगवान के समान होते हैं।
