■ सूर्यकांत उपाध्याय

श्री रामचंद्र डोंगरे जी महाराज ने अपने जीवनकाल में जितनी भी कथाएँ कीं, उनसे प्राप्त होने वाला समस्त धन दान में ही दे दिया जाता था।
अपने और अपने परिवार के लिए वे एक रुपया भी उपयोग नहीं होने देते थे। जो थोड़ा-बहुत अन्न या वस्त्र आ जाता, उसी से काम चलाते और बाकी सब वस्त्र संतों को दे देते थे।
मुंबई चौपाटी में उनकी अंतिम कथा हुई। उनकी कथाओं से गोरखपुर कैंसर अस्पताल, संत सेवा, गौ सेवा और दीन-दुखियों की सहायता सहित विभिन्न कार्यों में अब तक एक अरब रुपये से अधिक का दान दिया जा चुका था।
उनकी पत्नी राजस्थान के आबू में रहती थीं। महाराजश्री को उनके देहांत की सूचना पाँचवे दिन मिली। वे अस्थियाँ लेकर गोदावरी में विसर्जन करने पहुँचे।
उस समय मुंबई के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता रातिभाई पटेल भी साथ थे।
नासिक में श्री डोंगरे जी ने रातिभाई से कहा “रति, हमारे पास तो कुछ है नहीं और इनकी अस्थियों का विसर्जन करना है। थोड़ा धन तो लगेगा ही, क्या करें?”
फिर वे बोले, “हमारे पास इनका मंगलसूत्र और कर्णफूल हैं। इन्हें बेचकर जो रुपये मिलें, उन्हें अस्थि-विसर्जन में लगा देते हैं।”
यह सुनते ही रातिभाई स्तब्ध रह गए। वे बस महाराजश्री को देखते रह गए।
बाद में रातिभाई अपने परिचितों से कहते थे, “हम कैसे जीवित रह गए, यह हम ही जानते हैं। उस क्षण हमारा हृदय रुक ही गया होता। जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तत्पर रहते थे, जिनके आसपास बड़े-बड़े लोग रुपये लेकर खड़े रहते थे, वे महापुरुष कह रहे थे कि पत्नी की अस्थियों के विसर्जन के लिए भी उनके पास धन नहीं है… और हम खड़े सुन रहे थे!
हम तो फूट-फूटकर रो पड़े। धिक्कार है हम पर। असल में बादशाह तो संत जन ही हैं; व्यर्थ में हम स्वयं को बड़ा आदमी समझ बैठे थे।”
धन्य है भारतवर्ष, जहाँ ऐसे परम संत जन्म लेते हैं…!
