■ सूर्यकांत उपाध्याय

किसी शहर में दो भाई रहते थे। उनमें से एक शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमैन था तो दूसरा एक ड्रग एडिक्ट था जो अक्सर नशे की हालत में लोगों से मारपीट किया करता था। जब लोग इनके बारे में जानते तो बहुत आश्चर्य करते कि आखिर दोनों में इतना अंतर क्यों है जबकि दोनों एक ही माता-पिता की संताने हैं। दोनों को एक जैसी शिक्षा प्राप्त है और बिलकुल एक जैसे माहौल में पले-बढ़े हैं। कुछ लोगों ने इस बात का पता लगाने का निश्चय किया और शाम को भाइयों के घर पहुंचे। अंदर घुसते ही उन्हें नशे में धुत एक व्यक्ति दिखा।
वे उसके पास गए और पूछा,“भाई तुम ऐसे क्यों हो? तुम बेवजह लोगों से लड़ाई-झगड़ा करते हो। नशे में धुत अपने बीवी-बच्चों को पीटते हो। आखिर ये सब करने की वजह क्या है?”
“मेरे पिता”, भाई ने उत्तर दिया।
“पिता !! ….वो कैसे ?”, लोगों ने पूछा
भाई बोल, “मेरे पिता शराबी थे। वे अक्सर मेरी माँ और हम दोनों भाइयों को पीटा करते थे। भला तुम लोग मुझसे और क्या उम्मीद कर सकते हो। मैं भी वैसा ही हूँ …”
फिर वे लोग दूसरे भाई के पास गए। वो अपने काम में व्यस्त था और थोड़ी देर बाद उनसे मिलने आया।
“माफ कीजियेगा, मुझे आने में थोड़ी देर हो गई। बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?” भाई बोला।
लोगों ने इस भाई से भी वही प्रश्न किया, “आप इतने सम्मानित बिजनेसमैन हैं। आपकी हर जगह पहुंच है। सभी आपकी प्रशंसा करते हैं। आखिर आपकी इन उपलब्धियों की वजह क्या है?”
“मेरे पिता”, उत्तर आया।
लोगों ने आश्चर्य से पूछा, “भला वो कैसे?”
“मेरे पिता शराबी थे। नशे में वो हमें मारा-पीटा करते थे। मैं ये सब चुपचाप देखा करता था और तभी मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं ऐसा बिलकुल नहीं बनना चाहता। मुझे तो एक सभ्य, सम्मानित और बड़ा आदमी बनना है और मैं वही बना।” भाई ने अपनी बात पूरी की।
सीख: रावण और विभीषण दोनों एक ही पिता की संतानें थीं। लेकिन परिणाम आपके सामने है। अच्छा या बुरा बनना हमारी सोच पर निर्भर करता है।
