■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बनिया था। उसका व्यापार काफी अच्छे से चल रहा था पर उसके मन में साधु-संतों के प्रति गहरा प्रेम था। अतिथियों की सेवा वह श्रद्धा से करता था।
एक बार एक साधु उसके यहाँ आकर रुके। बनिये ने उनकी पूरी श्रद्धा से आवभगत की और भोजन कराया।
साधु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और सोचा कि इस बनिये की आत्मा का कल्याण अवश्य करना चाहिए।
उन्होंने बनिये से कहा, “भाई, मैं तुम्हे आत्मकल्याण का मार्ग बताना चाहता हूँ। क्या तुम यह मार्ग ग्रहण करोगे?”
बनिये ने कहा, “महाराज जी, अभी मैं बहुत व्यस्त हूँ। कुछ दिन बाद मार्ग बताइए ताकि मैं आत्मचिंतन के लिए समय निकाल सकूँ।” साधु जी वहाँ से चले गए।
दो-तीन वर्ष बाद साधु जी फिर उसके घर पहुँचे। बनिया घर पर नहीं था। उसके बच्चो ने साधु की आवभगत की और बताया कि उनके पिता का देहांत हो चुका है।
साधु जी ने ध्यान लगाया तो देखा कि वह बनिया अपने ही घर में बैल की योनि में जन्म ले चुका है।
उन्होंने बच्चों से पूछा, “क्या तुम्हारे घर कोई नया बैल आया है?”
बच्चो ने प्रसन्न होकर कहा, “हाँ”, और उन्हें बैल दिखाया।
साधु जी बैल के कान में बोले, “देखो, तुम काम-धंधे में ही फँसे रहे, आत्मकल्याण का मार्ग नहीं लिया, इसलिए योनि बदल गयी। क्या अब तुम आत्मकल्याण चाहते हो?”
बैल बोला, “महाराज, अभी तो खेत जोतने और गाडी खींचने में व्यस्त हूँ। कुछ दिन बाद आइये।” साधु जी लौट गए।
कुछ समय बाद वे फिर आये और पूछा, “तुम्हारा वह बैल कहाँ है?”
बच्चो ने बताया, “महाराज, वह तो मर गया।”
साधु जी ने पुनः ध्यान किया तो ज्ञात हुआ कि वह बैल अब कुत्ते की योनि में उसी घर में जन्मा है।
उन्होंने पूछा, “क्या तुम्हारे यहाँ कोई काला कुत्ता है?”
बच्चों ने कहा, “हाँ महाराज! छोटा है पर बहुत अच्छा है और अभी से खूब भौंकता है।”
साधु जी कुत्ते के पास गए और बोले, “भाई, अब अपनी आत्मा का कल्याण कर लो।”
कुत्ता बोला, “महाराज, अभी तो मैं घर की रखवाली करता हूँ। बच्चे भी दरवाजे पर ही गंदगी कर देते हैं, उसे साफ करता हूँ। कुछ दिन बाद आइये।” साधु जी फिर लौट गए।
साधु सोचते रहे, “मैंने बनिये की रोटी खाई है। जब तक उसकी आत्मा का कल्याण नहीं होगा, मेरा साधु कर्म भी पूरा नहीं होगा।”
कुछ समय बाद वे फिर पहुँचे। बच्चों से पूछा, “वह काला कुत्ता कहाँ है?”
बच्चे बोले, “वह भी मर गया, महाराज।”
ध्यान लगाने पर साधु जी ने देखा कि वह अब साँप बनकर अपने पुराने धन की रक्षा कर रहा है।
उन्होंने पूछा, “क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए कोई धन-संपत्ति रखी है?”
बच्चों ने कहा, “महाराज, रखी है लेकिन जैसे ही हम लेने जाते हैं, एक सांप फुफ्कार मारता हुआ बैठ जाता है!”
साधु बोले, “तुम मेरी बात मानो। डंडे लेकर चलो। मैं तहखाना खोलूँगा। सांप फुफ्कार मारेगा। तुम लोग उसे डंडे से मारना पर सिर पर चोट मत करना। वह मरना नहीं चाहिए, बस घायल हो जाये।”
बच्चो ने ऐसा ही किया। साँप घायल होने पर साधु जी उसके कान में बोले, “अब तुम क्या चाहते हो? जिसकी रखवाली करते रहे, वही तुम्हे डंडो से मार रहे हैं!”
दर्द से व्याकुल साँप बोला, “महाराज, अब असहनीय पीड़ा हो रही है। मेरा आत्मकल्याण कीजिये!”
तब महात्मा जी ने अपनी खायी हुई रोटी का ऋण चुकाया और उसका आत्मकल्याण कर दिया, जिससे वह जीवात्मा चौरासी की योनियों में भटकने से मुक्त हो गयी।
हे नाथ! हे मेरे नाथ! मैं आपको कभी न भूलूँ!
