■ सूर्यकांत उपाध्याय

क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषशैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया से बाहर आ गया था और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगी थीं।
क्षीरसागर के एक कछुए ने यह दृश्य देखा। उसके मन में विचार आया कि यदि वह भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिह्वा से स्पर्श कर ले तो उसका मोक्ष हो जाएगा। यह सोचकर वह उनकी ओर बढ़ा।
उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुए शेषनाग जी ने देख लिया और कछुए को भगाने के लिए जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुनकर कछुआ भागकर छिप गया।
कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया।
इस प्रकार उस कछुए ने अनेक प्रयास किए पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली। इसी बीच सृष्टि की रचना हो गई और सतयुग बीतने के बाद त्रेता युग आ गया।
इस अवधि में उस कछुए ने अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयास करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि प्राप्त कर ली थी।
कछुए को यह ज्ञात था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु भगवान राम के रूप में, वही शेष जी लक्ष्मण के रूप में और वही लक्ष्मी देवी सीता के रूप में अवतरित होंगे। वनवास के समय उन्हें गंगा पार करनी होगी, इसलिए वह केवट बनकर वहाँ आ गया।
एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सभी मर्म जान लिए थे। इसी कारण उसने भगवान राम से कहा था, “मैं आपका मर्म जानता हूँ।”
संत श्री तुलसीदास जी भी इस तथ्य को जानते थे, इसलिए उन्होंने अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है, “कहहिं तुम्हार मरमु मैं जाना।”
इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी तरह हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उसे स्मरण था कि पहले शेषनाग क्रोध में फुँफकारते थे और वह डर जाता था।
अबकी बार लक्ष्मण के रूप में वे उस पर बाण भी चला सकते थे पर इस बार उसने भय त्याग दिया था। लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं।
इसीलिए संत श्री तुलसीदास जी ने लिखा है,“नाथ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ाऊँगा। मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं सत्य कह रहा हूँ। चाहे लक्ष्मण जी मुझे तीर मार दें पर जब तक आपके चरण नहीं पखार लूँगा, तब तक, हे कृपालु, मैं पार नहीं उतारूँगा।”
तुलसीदास जी आगे लिखते हैं, केवट के प्रेम से भरे, किंचित् अटपटे वचनों को सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्र जी जानकी जी और लक्ष्मण जी की ओर देखकर मुस्कराए, मानो पूछ रहे हों, “बताओ, अब क्या करूँ? उस समय तो यह केवल अंगूठे का स्पर्श चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे, अब यह दोनों चरण माँग रहा है।”
केवट अत्यंत चतुर था। उसने न केवल स्वयं बल्कि अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवाया। तुलसीदास जी लिखते हैं, केवट ने प्रभु के चरण धोकर, पूरे परिवार सहित चरणामृत का पान किया और उसी जल से पितरों का तर्पण कर उन्हें भवसागर से पार कराया। इसके बाद वह आनंदपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्र जी को गंगा पार ले गया।
यह उस समय का प्रसंग है, जब केवट भगवान के चरण धो रहा है।
दृश्य अत्यंत मनोहर है। वह भगवान का एक चरण धोकर उसे कठौती से बाहर रख देता है और जब दूसरे चरण को धोने लगता है, तो पहला चरण गीला होने के कारण भूमि पर रखते ही धूल से भर जाता है।
केवट दूसरा चरण बाहर रखता है, फिर पहले को धोता है। इस प्रकार वह एक-एक चरण को सात-सात बार धोता है। इसके बाद वह कहता है,“प्रभु! एक चरण कठौती में रखिए और दूसरा मेरे हाथ पर ताकि मैला न हो।”
जब भगवान ऐसा करते हैं तो कल्पना कीजिए, एक चरण कठौती में और दूसरा केवट के हाथों में। भगवान दोनों पैरों पर खड़े नहीं हो पाते और कहते हैं “केवट, मैं गिर जाऊँगा।”
केवट उत्तर देता है, “चिंता क्यों करते हैं, भगवन्! दोनों हाथ मेरे सिर पर रखकर खड़े हो जाइए, तब नहीं गिरेंगे।”
जैसे कोई छोटा बच्चा स्नान करते समय माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा होता है, उसी प्रकार भगवान भी उस समय खड़े होते हैं।
तब भगवान केवट से कहते हैं, “भैया केवट! आज मेरे भीतर का अभिमान टूट गया।”
केवट बोला, “प्रभु! आप क्या कह रहे हैं?”
भगवान बोले,“सच कह रहा हूँ, केवट। अब तक मेरे भीतर यह भाव था कि मैं भक्तों को गिरने से बचाता हूँ, पर आज समझ आया कि भक्त भी भगवान को गिरने से बचाता है।”
