■ सूर्यकांत उपाध्याय

अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी। वह साथ लौट रही भीड़ के आगे‑आगे तो चल रहा था, पर उसका मन उसी वेग से पीछे भाग रहा था। साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे, लेकिन वह जानता था कि ये आँसू केवल शोक के नहीं बल्कि उसके भीतर चल रहे प्रायश्चित के भी थे। उसे बार‑बार यह अफसोस हो रहा था कि वह पिता की बात क्यों नहीं मान पाया। उसने वही सब क्यों किया, जिससे दूर रहने की सलाह उसके पिता हमेशा दिया करते थे।
वह एकांत में जाकर फूट‑फूटकर रो पड़ा। उसे लगने लगा कि उसका विजातीय विवाह ही शायद पिता की मृत्यु का कारण बना। अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में विवाह किया था। उसने एक बार भी पलटकर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नहीं समझा और शहर से बाहर चला गया, यह सोचे बिना कि उसके बिना माँ‑पिताजी का क्या हाल होगा।
कैसा भय था यह, कैसी संवादहीनता पिता‑पुत्र के बीच पसरी थी, जिसने उसे अपने पिता का सामना करने तक से रोक दिया। काश! वह एक बार तो अपने मन की बात पिता से कह देता। पिताजी उससे कितना प्रेम करते थे… और माँ? माँ को ही बता देता। शायद… नहीं, निश्चित रूप से पिताजी उसकी शादी मनोरमा से ही करा देते। वे जात‑पात में विश्वास ही नहीं रखते थे। क्या वे अपने इकलौते पुत्र की बात नहीं मानते? ज़रूर मानते। गलती उसी से हुई थी, जिसकी इतनी बड़ी सजा उसे मिली। अब वह माफ़ी भी माँगे तो किससे? क्या समय लौट सकता है?
तभी मनोरमा की करुण आवाज़ से सिद्धार्थ की तंद्रा टूटी। वह कह रही थी,
“खुद को संभालो, सिद्धार्थ। अब माँजी को देखो। रो‑रोकर उनका बुरा हाल हो गया है। वे बार‑बार अचेत हो रही हैं। मैंने डॉक्टर अंकल को फोन कर दिया है, वे आते ही होंगे। अब चलो… कब तक माँ से दूर भागोगे? माँ ने हमें माफ़ कर दिया है। उन्होंने मुझे ‘बेटी’ कहकर गले लगाया है। अब से मैं ही उनकी देखभाल करूँगी। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए और माँ से मिल लीजिए।”
मनोरमा की बातों से सिद्धार्थ कुछ संभला। खुद को संयत कर वह माँ के कमरे में पहुँचा और उनसे लिपटकर फूट‑फूटकर रो पड़ा।
तीसरे दिन, जब सिद्धार्थ ने पिताजी की अलमारी खोली, तो उसमें से एक पत्र मिला। लिफ़ाफ़े पर लिखा था-प्रिय बेटे सिद्धार्थ।
थरथराते हाथों से उसने पत्र खोला। उसमें लिखा था-
“सिद्धार्थ,
तुम इतने बड़े कब हो गए कि अपने जीवन का निर्णय खुद ले लिया और मुझे बताया तक नहीं? एक बार मुझसे या अपनी माँ से कहकर तो देखते। कितनी धूमधाम से हम तुम्हारी शादी करते। बचपन से आज तक हमने तुम्हारी खुशियाँ ही तो देखी हैं।
जानता हूँ, तुम ज़िद्दी स्वभाव के हो, पर यह नहीं जानता था कि तुम मुझसे इतने डरते हो। यह भी नहीं जानता कि बिना बताए शादी तुमने मेरे डर से की या किसी और कारण से। यदि हर बेटा ऐसा करेगा, तो माता‑पिता का अपने बच्चों से विश्वास ही उठ जाएगा।
खैर, जो हुआ, सो हुआ। जब भी घर लौटो, इस विश्वास के साथ लौटना कि यह घर तुम्हारा है और हम तुम्हारे हैं।”
अंत में लिखा था-
“काश! तुम मेरे रहते लौट आओ। तुम और तुम्हारी माँ नहीं जानते कि मुझे ब्लड कैंसर है। यदि तुम्हारे लौटने से पहले ही मैं दुनिया छोड़ दूँ, तो मन में यह बोझ लेकर नहीं जीना चाहता कि मेरी मृत्यु तुम्हारे कारण हुई।
बहू को मेरा आशीर्वाद।
अपनी माँ का ख्याल रखोगे, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।”
- तुम्हारा पिता
