■ हिमांशु राज़

देश में भूजल का संकट अब चेतावनी से आगे बढ़कर बड़ी आपदा का रूप ले चुका है। टाइम्स ऑफ इंडिया की नई रिपोर्ट कहती है कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे उत्तर के राज्य ‘डे जीरो’ की ओर सबसे तेजी से जा रहे हैं। यहां पानी की पूरी कमी हो जाएगी तो खेती रुक जाएगी, शहर सूख जाएंगे और लाखों लोग अपना घर छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे। आजादी के बाद से तेज खेती, मुफ्त बिजली और बिना प्लान के शहर बनने से भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है। कई जगहों पर ट्यूबवेल 300-400 मीटर गहरा खोदना पड़ रहा है।
हरियाणा के नारनौंद जैसे गांव पहले हरे-भरे थे, अब पानी के लिए तरस रहे हैं। किसान मजबूरी में खेत छोड़ रहे हैं। इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं। पंजाब और हरियाणा में गेहूं-धान की फसलें भूजल का सबसे बड़ा दुश्मन बन गई हैं। पंजाब में हर साल 20 अरब क्यूबिक मीटर पानी निकल जाता है, लेकिन प्रकृति इतना पानी वापस नहीं भर पाती। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा के 80 प्रतिशत ब्लॉक खराब या बहुत ज्यादा इस्तेमाल वाले हो चुके हैं। यहां पानी निकालना भरने से 150 प्रतिशत ज्यादा है। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों जैसे जोधपुर और बाड़मेर में हालत और खराब है 65 प्रतिशत जगह भूजल खत्म होने की कगार पर है।
उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से, जैसे मेरठ और सहारनपुर, में भी 50 प्रतिशत से ज्यादा कमी हो चुकी है। दिल्ली जैसे बड़े शहर भी यमुना पर टिके हैं, लेकिन वहां भूजल 300 मीटर नीचे चला गया है। इससे जमीन धंस रही है और इमारतें लड़खड़ा रही हैं। ये आंकड़े सिर्फ नंबर्स नहीं, बल्कि किसानों की बेरोजगारी और शहरवासियों की प्यास की कहानी हैं।विशेषज्ञ कहते हैं कि मुफ्त बिजली ने यह संकट पैदा किया। किसान रात-दिन ट्यूबवेल चलाते हैं क्योंकि बिल नहीं आता, लेकिन पानी का हिसाब कोई नहीं रखता। नतीजा यह कि नदियां सूख गई हैं सतलुज, व्यास और घग्गर अब मौसमी नालियां बनकर रह गई हैं। झीलें और तालाब गायब हो गए, जो पहले पानी भरते थे।

पर्यावरण वाले चेताते हैं कि अगर ऐसा ही चला तो 2030 तक ये राज्य ‘डे जीरो’ देखेंगे। तब न पीने का पानी बचेगा, न खेती का। हरियाणा में 5 लाख से ज्यादा ट्यूबवेल हैं, जो हर साल 18-20 अरब क्यूबिक मीटर पानी पी जाते हैं। बारिश से सिर्फ 9 अरब भरता है। राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर ने सिंचाई बढ़ाई, लेकिन भूजल और कम कर दिया। उत्तर प्रदेश में गंगा के कई इलाके प्रभावित हैं, जहां फैक्टरियां पानी गंदा कर रही हैं।सरकारें अब जाग रही हैं, लेकिन कदम बहुत धीमे हैं। पंजाब में ‘क्रॉप डाइवर्सिटी’ चल रही है, जिसमें धान की जगह मक्का, बाजरा या सब्जियां उगाने को कहा जा रहा है। हरियाणा ने बारिश के पानी को बचाना जरूरी किया है, लेकिन शहरों में कोई मानता नहीं।
राजस्थान में ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान’ तालाब और चेकडैम बना रहा है। केंद्र की ‘अटल भूजल योजना’ हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश पर ध्यान दे रही है। लेकिन असलियत ये कि ये प्लान कागज पर अच्छे हैं, जमीन पर मीटर, सब्सिडी बदलाव और सख्त कानून नहीं हैं। राजनीति में चुनाव के समय पानी भूल जाता है, क्योंकि वोट मुफ्त बिजली से आते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ड्रिप-स्प्रिंकलर को 50 प्रतिशत बढ़ाएं, नदियों का पानी रिचार्ज जोन में डालें और भूजल पर टैक्स लगाएं। बिना इनके योजनाएं सिर्फ फोटो तक रहेंगी।
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल इस्तेमाल करता है, कुल 25 प्रतिशत। कैलिफोर्निया और स्पेन ने ऐसे संकट से सबक लिया; सब्सिडी रोकी, फसलें बदलीं और कानून सख्त किए। हम क्यों न अपनाएं? हरियाणा के नारनौंद जैसे गांव संकेत दे रहे हैं, किसान खेत बेचकर मजदूरी कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी अगर हम अभी न जागें। समय है सब मिलकर पानी बचाएं वरना ‘डे जीरो’ हमारी हकीकत बन जाएगा। समाज, सरकार और किसान एक होकर यह लड़ाई लड़ें, ताकि हर बूंद बचे।
