■ सूर्यकांत उपाध्याय

शेखर चार बहनों का इकलौता और सबसे छोटा भाई था। चारों बहनों की शादी हो चुकी थी। बीमारी के कारण माता-पिता का निधन हो चुका था।
चारों बहनों ने अपने इकलौते भाई के लिए एक से बढ़कर एक लड़कियाँ ढूँढीं,
पर शेखर हर बार कोई-न-कोई बहाना बना देता और शादी से मना कर देता।
बहनें परेशान हो चुकी थीं।
इस बार राखी पर अपने भाई से साफ-साफ बात करने की ठानकर चारों मायके आईं। यही एक ऐसा त्योहार होता था, जब चारों बहनें मायके आती थीं।
राखी बाँधने का काम पूरा होने के बाद चारों बहनें शेखर को घेरकर बैठ गईं और एक-एक कर सवालों की बौछार करने लगीं कि वह किसी लड़की को क्यों पसंद नहीं कर रहा।
परेशान होकर शेखर ने बता ही दिया कि वह अपने ऑफिस की एक लड़की, पायल, से प्यार करता है और उसी से शादी करना चाहता है।
पायल एक अलग जाति से थी।
बहनों ने ऐतराज़ जताया कि उनके घर में यह सब नहीं चलता।
दूसरी बहन बोली,
“हम अपने ससुराल में क्या जवाब देंगे?”
तीसरी बहन बोली,
“अगर तुमने ऐसा किया तो हम समझेंगे कि हमारा मायका अब नहीं रहा।”
उसे लगा, ऐसा कहने से शेखर शायद अपना विचार बदल ले।
शेखर, जो बचपन से ही ज़िद्दी था, उसने अपना फ़ैसला सुना दिया-
“मैं शादी करूँगा तो बस पायल से।”
चारों बहनें शेखर की जिद जानती थीं।
चारों नाराज होकर अपने-अपने ससुराल लौट गईं।
शेखर ने सबको मनाने की बहुत कोशिश की, पर कोई नहीं माना। आख़िरकार उसने पायल से कोर्ट मैरिज कर ली।
इसके बाद बहनों ने उससे बात करना तक बंद कर दिया।
हर साल राखी पर शेखर को अपनी बहनों की बहुत याद आती। पायल भी उस दर्द को समझती थी। शेखर दोस्तों के ज़रिए अपनी बहनों की खबर लेता रहता था।
पायल कहती,
“अब तो बहुत समय बीत चुका है। आप ही फ़ोन करके बात कर लीजिए…
छोटे हो आप।”
शेखर बोला,
“मैं तो बात कर लूँगा। मुझे किसी ने कुछ कहा तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा पर तुम्हें किसी ने कुछ कहा तो मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। कहीं रिश्ते और बिगड़ न जाएँ।”
दिन बीते, साल बीते। एक दिन खबर आई कि शेखर की तीसरी बहन के पति का सड़क हादसे में निधन हो गया। शेखर के पैरों तले जमीन खिसक गई।
पायल ने तुरंत निकलने की तैयारी कर दी। शेखर निकलते-निकलते रुक गया।
शेखर बोला,
“मैं वहाँ कैसे…?”
पायल ने कहा, “अभी आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत आपकी बहन को है।
कोई कुछ कह भी दे, तो सुन लीजिएगा।
और सुनिए, मैंने आपके बैग में एक चिट्ठी रखी है। वापस आने से पहले किसी एक बहन को दे दीजिएगा।”
शेखर चिट्ठी के बारे में पूछने की मनःस्थिति में नहीं था।
“ठीक है…” कहकर वह निकल गया।
शेखर बहन के ससुराल पहुँचा।
भाई को देखते ही बहन उसके गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
बहन का रोना जैसे भाई की आत्मा को चीर गया हो।
सारी अंतिम क्रियाएँ पूरी हो गईं।
शेखर लौटने की तैयारी करने लगा।
बड़ी बहन उसका सामान बैग में रख रही थी, तभी उसके हाथ पायल की रखी चिट्ठी लग गई।
ऊपर लिखा था-“दीदी, एक बार ज़रूर पढ़िएगा।”
हिचकिचाहट के साथ बहन ने चिट्ठी खोली।
उसमें लिखा था-
प्रणाम,
मैं आप सबसे पहले तो माफ़ी चाहती हूँ कि इस दुख की घड़ी में मैं वहाँ आप लोगों के साथ नहीं हूँ,
पर मैं और आपके भाई हमेशा आप लोगों के साथ हैं।
यह आपका मायका पहले है, मेरा ससुराल बाद में। आपका पूरा हक है अपने भाई पर और अपने मायके पर।
मैं आप लोगों के बीच न कभी आई थी, न कभी आऊँगी। मुझसे कोई गलती हुई हो, तो माफ़ कर दीजिए पर अपने भाई को अनाथ मत कीजिए।
विनम्रतापूर्वक
पायल
उस समय बड़ी बहन ने इस चिट्ठी का ज़िक्र किसी से नहीं किया। समय बीता।अगले साल राखी आ गई।
सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी।
पायल ने शेखर से दरवाजा खोलने को कहा।
शेखर ने दरवाज़ा खोला, तो सामने चारों बहनों को देखकर खुशी से चिल्ला उठा, “पायल, देखो कौन आया है!”
पायल हाथ में पानी का गिलास लेकर बाहर आई। वह जानती थी कि आज राखी पर शेखर की बहनें आने वाली हैं, यह बात उसे उन्हीं लोगों ने फोन करके बताई थी।
चारों बहनों ने कई सालों बाद मायके में कदम रखा। सबसे पहले उन्होंने पायल को गले लगाया और कहा, “तुम्हारी चिट्ठी ने हमें हिम्मत दी कि हम अपने मायके आ सकें। तुमने आज हमारा मायका हमें वापस दे दिया। हमेशा खुश रहो।”
इतने सालों बाद शेखर के हाथ में उसकी बहनों ने राखी बाँधी। उसकी खुशी उसकी आँखों में साफ दिखाई दे रही थी और उसे देखकर पायल भी मुस्कुरा रही थी।
