■ सूर्यकांत उपाध्याय

डिप्रेशन-ग्रस्त एक सज्जन, जब पचास वर्ष की उम्र से अधिक के हो गए तो उनकी पत्नी ने एक काउंसलर का अपॉइंटमेंट लिया, जो ज्योतिषी भी थे।
पत्नी बोली, “ये भयंकर डिप्रेशन में हैं, इनकी कुंडली भी देखिए।” साथ ही उन्होंने बताया कि इन सब कारणों से वह स्वयं भी ठीक नहीं हैं।
ज्योतिषी ने कुंडली देखी, सब कुछ ठीक पाया। इसके बाद उन्होंने काउंसलिंग शुरू की। कुछ निजी प्रश्न पूछे और फिर सज्जन की पत्नी को बाहर बैठने को कहा।
सज्जन बोलते चले गए, “बहुत परेशान हूँ। चिंताओं से दब गया हूँ…नौकरी का प्रेशर…बच्चों की पढ़ाई और नौकरी की टेंशन…घर का लोन, कार का लोन…कुछ भी अच्छा नहीं लगता…दुनिया मुझे तोप समझती है पर मेरे पास कारतूस जितना भी ‘पावर’ नहीं…मैं डिप्रेशन में हूँ…”
यह कहते-कहते उन्होंने मानो अपने पूरे जीवन की किताब खोल दी।
तब विद्वान काउंसलर ने कुछ सोचा और पूछा, “दसवीं में आप किस स्कूल में पढ़ते थे?”
सज्जन ने स्कूल का नाम बता दिया।
काउंसलर ने कहा, “आपको उसी स्कूल में जाना होगा। वहाँ से अपनी दसवीं कक्षा का रजिस्टर निकालिए, अपने सहपाठियों के नाम देखिए और उन्हें ढूँढकर उनके वर्तमान हालचाल की जानकारी लाने की कोशिश कीजिए। सारी जानकारी एक डायरी में लिखिए और एक महीने बाद मुझसे मिलिए।”
सज्जन स्कूल गए। बहुत मिन्नतों के बाद रजिस्टर ढूँढवाया और उसकी प्रति निकलवा लाए। उसमें 120 नाम थे। महीने-भर दिन-रात कोशिश करने के बाद भी वे मुश्किल से 75–80 सहपाठियों की जानकारी जुटा पाए।
आश्चर्य!
उनमें से 20 लोग मर चुके थे…7 विधवा/विधुर और 13 तलाकशुदा थे…10 नशेड़ी निकले, जिनसे बात करना भी संभव नहीं था…कुछ का कोई पता ही नहीं चला कि वे अब कहाँ हैं…5 अत्यंत ग़रीब निकले…
6 इतने अमीर थे कि यकीन करना मुश्किल था…कुछ कैंसर से पीड़ित थे, कुछ लकवे, डायबिटीज, अस्थमा या हृदय रोग से…एक-दो लोग एक्सीडेंट में हाथ-पाँव या रीढ़ की हड्डी की चोट के कारण बिस्तर पर थे…कुछ के बच्चे मानसिक रूप से अस्वस्थ, आवारा या निकम्मे निकले…एक जेल में था…एक 50 वर्ष की उम्र में सेटल हुआ था और अब शादी करना चाहता था…
एक अब भी सेटल नहीं था, फिर भी दो तलाक़ के बाद तीसरी शादी की फिराक में था…
महीने भर में दसवीं कक्षा का रजिस्टर मानो भाग्य की व्यथा स्वयं सुना रहा था।
काउंसलर ने पूछा, “अब बताइए, डिप्रेशन कैसा है?”
तब सज्जन को समझ आ गया कि उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं है, वे भूखे नहीं मर रहे, उनका दिमाग पूरी तरह स्वस्थ है,
कचहरी-पुलिस-वकीलों से उनका कोई वास्ता नहीं पड़ा, उनके बीवी-बच्चे अच्छे और स्वस्थ हैं, वे स्वयं भी स्वस्थ हैं,
डॉक्टर और अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने पड़ रहे हैं।
सज्जन को एहसास हुआ कि दुनिया में वास्तव में बहुत दुख है और वे स्वयं बहुत सुखी तथा भाग्यशाली हैं।
