■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक रात, थका-हारा और फटे-पुराने कपड़े पहने एक व्यक्ति होटल के दरवाजे पर दस्तक देता है।
“मैडम… क्या मुझे एक कमरा किराए पर मिल सकता है?”
“बिल्कुल सर। आइए, अपने घर जैसा समझिए।”
“सच में? मैं अंदर आ सकता हूँ?”
“जी हाँ, क्यों नहीं।”
“मैं… गंदा हूँ, मेरे कपड़े फटे हुए हैं…”
“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, भाई। कृपया अंदर आ जाइए।”
वह व्यक्ति लॉबी में दाख़िल हुआ और चारों तरफ़ देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई।
“कितना खूबसूरत होटल है… मैंने बहुत दिनों से ऐसी जगह नहीं देखी। पिछले तीन दिनों से मैं सड़क पर सो रहा हूँ। आज… शायद मुझे बिस्तर मिल जाए।”
कुछ देर बाद वह काउंटर के पास आया।
“मैडम… आपका सबसे सस्ता कमरा कौन-सा है?”
“हमारा सबसे कम रेट 250 डॉलर है।”
“250?… मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं। मेरे पास सिर्फ़ दस डॉलर हैं। क्या दस डॉलर में कुछ छोटा-मोटा मिल सकता है? चाहे ज़मीन पर गद्दा ही दे दें… मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।”
“माफ़ कीजिए सर, इस कीमत में हमारे पास कुछ भी उपलब्ध नहीं है।”
वह व्यक्ति नज़रें झुकाकर बोला-
“मैं समझ गया… बस उम्मीद थी। लेकिन क्या… इन दस डॉलर के बदले मैं सिर्फ़ नहा सकता हूँ? खुद को साफ़ कर लूँ? मैं बहुत बुरी हालत में हूँ। नौकरी ढूँढने के लिए भी साफ़-सुथरा होना ज़रूरी है। लोग ऐसे अंदर आने भी नहीं देते…”
“माफ़ करें सर, हमारे नियम इसकी इजाज़त नहीं देते।”
“ठीक है, मैडम। फिर भी भगवान आपको खुश रखे।”
रिसेप्शनिस्ट महिला ने गहरी साँस ली।
“रुकिए… आपकी बात सुनकर और आपकी नीयत देखकर… मैं आपको इन दस डॉलर में आज की रात ठहरा देती हूँ।”
“सच?”
“जी, आइए।”
“बहुत-बहुत शुक्रिया… भगवान आपको अच्छा फल दे।”
अगली सुबह-
“सुप्रभात, मैडम।”
“सुप्रभात। रात कैसी गुज़री?”
“दिनों बाद सुकून की नींद आई। आपकी मेहरबानी का शुक्रिया। मैं कमरे की असली क़ीमत तो नहीं दे सकता, लेकिन… क्या इसके बदले मैं कुछ पढ़कर सुना दूँ? बाइबिल की एक आयत?”
महिला मुस्कुरा दीं।
“ज़रूर, मुझे सुनकर खुशी होगी।”
वह व्यक्ति पढ़ने लगा-
“जब दुनिया ने तुम्हें भुला दिया, मैंने नहीं भुलाया।
मैंने तुम्हें तुम्हारे सबसे मुश्किल वक़्त में संभाला।
आज मैं तुम्हारे दिल से ग़म धोकर कहता हूँ-
जो दुआएँ तुमने घुटनों के बल रो-रोकर माँगी थीं,
वे सब मैंने सुन ली हैं।
अब तुम्हारी कामयाबी आ रही है
और आज ही आ रही है।”
महिला की आँखों में आँसू आ गए।
“आप नहीं जानते… मैं कई रातों से घुटनों के बल बैठकर यही दुआ माँगती रही हूँ कि भगवान मुझे न छोड़े। कई हफ़्तों से एक भी ग्राहक नहीं आया। आप पहले इंसान हैं। मुझे लगा था भगवान मुझे भूल गए। लेकिन आपकी बात… मेरी दुआ का जवाब थी।”
वह व्यक्ति सीधे उनकी आँखों में देखने लगा।
“तो फिर मुझे सच बताना पड़ेगा, मैडम। मैं बेघर नहीं हूँ।”
“क्या?”
“मैं होटलों का मालिक हूँ। मैं कल रात एक मक़सद के लिए निकला था। अगर मेरा कारोबार चलता रहा, तो मैं किसी की ज़िंदगी बदल दूँगा। मैंने बीस से ज़्यादा होटल देखे, लेकिन किसी ने मुझे अंदर नहीं आने दिया… सिवाय आपके। अब मुझे समझ आ गया कि क्यों। भगवान आपकी तैयारी कर रहे थे… और मुझे अपना ज़रिया बनाया।”
“आप क्या कह रहे हैं…?”
“मैंने भगवान से वादा किया था कि जो शख़्स मेरा साथ देगा, मैं उसे दस लाख डॉलर दूँगा। और वह शख़्स… आप हैं।”
भगवान कभी-कभी चुप रहकर काम करता है।
कभी लगता है कि कुछ भी नहीं बदल रहा, लेकिन जब उसका जवाब आता है… सब कुछ बदल जाता है।
यक़ीन रखो।
दुआ कबूल होती है मगर अपनी मुकर्रर घड़ी में।
