■ सूर्यकांत उपाध्याय

18 दिन के युद्ध ने द्रौपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।
शहर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था। विलाप था। पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ते थे।
अनाथ बच्चे इधर-उधर भटकते दिखाई देते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी शून्य को निहार रही थी।
तभी श्रीकृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं।
द्रौपदी, कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है। कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और उसे रो लेने देते हैं।
थोड़ी देर बाद, उसे स्वयं से अलग कर समीप के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रौपदी : यह क्या हो गया, सखा? ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था।
कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है, पांचाली…वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती। वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है। तुम प्रतिशोध चाहती थीं और तुम सफल हुईं, द्रौपदी।
कृष्ण बोले, ‘तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ। सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए। तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।’
द्रौपदी : सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने?
कृष्ण : नहीं, द्रौपदी। मैं तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने आया हूँ।
हम अपने कर्मों के परिणाम दूर तक नहीं देख पाते और जब वे हमारे सामने होते हैं तो हमारे हाथ में कुछ नहीं रह जाता।
द्रौपदी : तो क्या इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ, कृष्ण?
कृष्ण : नहीं, द्रौपदी। तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
लेकिन यदि तुम अपने कर्मों में थोड़ी-सी दूरदर्शिता रखतीं तो स्वयं इतना कष्ट कभी न पातीं।
द्रौपदी : मैं क्या कर सकती थी, कृष्ण?
कृष्ण : तुम बहुत कुछ कर सकती थी।
जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ, तब तुम कर्ण का अपमान न करतीं और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर देतीं, तो शायद परिणाम कुछ और होते।
कृष्ण ने कहा, ‘इसके बाद, जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया, यदि तुम उसे स्वीकार न करतीं तो तब भी परिणाम कुछ और हो सकते थे।
कृष्ण बोलते रहे और द्रौपदी सिर झुकाए सब सुनती रही…
‘और उसके बाद, जब तुमने अपने महल में दुर्योधन का अपमान किया कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं, यदि वह न कहा होता तो तुम्हारा चीरहरण भी न होता। तब भी शायद परिस्थितियाँ कुछ और होतीं। हमारे शब्द भी हमारे कर्म होते हैं, द्रौपदी!’
महल के कक्ष में शांति पसर गई।
