■ गोरेगांव-बांगुर नगर में श्रीराम कथा

● मुंबई
गोरेगाँव पश्चिम स्थित बांगुर नगर के लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड पर चंद्रकांत गुप्ता एवं चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से, प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज के कृपापात्र पूज्य राजन महाराज के व्यासत्व में रामकथा सेवा समिति, मुम्बई द्वारा आयोजित नौ दिवसीय रामकथा महोत्सव में अयोध्याकांड के प्रसंगों के माध्यम से भावपूर्ण रामकथा का गायन किया गया।
पूज्य राजन महाराज ने कहा कि दशरथ महाराज के प्राणोत्सर्ग के उपरांत भरत जी ने मुखाग्नि देकर श्राद्ध कर्म संपन्न किया। उन्होंने बताया कि माता-पिता का श्राद्ध कर्म अत्यंत श्रद्धा से करना चाहिए, परंतु माता-पिता के प्रति श्रद्धा उनके जीवित रहते दिखानी चाहिए; मृत्यु के बाद की श्रद्धा का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता।
राजन महाराज ने गुरु वशिष्ठ के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश, ये छहों विधाता के हाथ में होते हैं। उन्होंने कहा कि दशरथ महाराज जैसा सौभाग्यशाली न कोई हुआ है और न होगा।
भरत जी के राम-प्रेम का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वस्त्रों के बिना आभूषणों से सुसज्जित स्त्री का शरीर, प्रेम के बिना जप-तप, और प्राण के बिना शरीर व्यर्थ है, उसी प्रकार भरत जी के लिए राम के बिना अयोध्या भी निरर्थक थी।
उन्होंने बताया कि वाल्मीकि जी की आज्ञा से भगवान चित्रकूट निवास करने पहुँचे, जहाँ देवताओं ने स्वयं उनके लिए दो सुंदर कुटियाओं का निर्माण किया। भगवान रावण-वध के लिए नहीं, बल्कि वनवासियों को दर्शन देने के लिए वन में आए थे। पूज्य राजन महाराज ने कहा कि जब वनवासियों को भगवान के दर्शन प्राप्त हो गए, तो आज हमें क्यों नहीं मिल रहे, इसका कारण शायद हमारे विश्वास की कमी है।
उन्होंने बताया कि पुण्यात्मा के प्राण शरीर के ऊपरी भाग से निकलते हैं जबकि अधर्म करने वाले के प्राण शरीर के निचले भाग से निकलते हैं।

पूज्य राजन महाराज ने निषादराज प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन्हें समाज अछूत मानता था, ऐसे प्रभु के मित्र निषादराज को भरत जी ने हृदय से लगा लिया। उन्होंने कहा कि छोटी जाति में जन्म लेने वाला नीच नहीं होता, नीच वह होता है जो मनुष्य जन्म पाकर भी भगवान की भक्ति नहीं कर पाया।
उन्होंने कहा कि जैसे पूर्व दिशा की पहचान सूर्य से होती है, वैसे ही अयोध्या की पहचान राम से है; इसलिए राम अयोध्या का त्याग कभी नहीं कर सकते। जीवन में संबंध अत्यंत अनमोल और महत्वपूर्ण होते हैं, इन्हें सहेजकर रखना चाहिए।
माँ की ममता का महिमा-गान करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि धरती पर चोट खाकर भी क्षमा करने का सामर्थ्य माँ के अतिरिक्त किसी में नहीं होता। भगवान के प्रति अपराध हो जाए तो भी क्षम्य हो सकता है, किंतु माँ के प्रति किया गया अपराध अक्षम्य है।
भरत चरित्र का समापन करते हुए उन्होंने कहा, “राम जी के चरणों में प्रेम और विषयासक्त मन को वैराग्य की प्राप्ति, यह भरत चरित्र सुनने की फलश्रुति है।”
भरत चरित्र का मार्मिक वर्णन सुनकर श्रोताओं के नेत्र सजल हो गए। इसके पश्चात कथा अरण्यकांड और किष्किन्धाकांड में प्रवेश कर गई। शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश, शूर्पणखा की दुर्दशा, खर-दूषण वध, सीता हरण, जटायु उद्धार, सुग्रीव से मित्रता, बालि वध, जयंत को प्राणदान जैसे प्रसंगों का सजीव वर्णन किया गया।
कथा प्रसंगों के मध्य पूज्य राजन महाराज ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में “मुझे कौन पूछता था तेरी बंदगी से पहले”, “हमार भइया जी, हमके बने रहै द”, “घरे जा भइया जी”, “यदि नाथ का नाम दयानिधि है”, “प्राण निकल चाहे रे माई, जब-जब याद पड़े रघुराई”, “अगर माँ ने ममता लुटाई न होती”, “अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे” जैसे लोकप्रिय भजनों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को भाव- विभोर कर दिया।
कथा के दौरान श्रोताओं की अपार भीड़ उपस्थित रही। समाजसेवी गणेश अग्रवाल, दिनेश तिवारी, निशा शर्मा, अशोका तिवारी, रेखा गुप्ता, सरिता चौबे सहित अनेक श्रद्धालुओं ने कथा-श्रवण का लाभ प्राप्त किया।
