■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक छोटे से गाँव में एक साधारण कुम्हार रहता था। वह रोज मेहनत से मिट्टी के दीये बनाता और शाम होते ही उन्हें गाँव के चौराहे पर बेचने बैठ जाता। एक दिन तेज़ आँधी चलने लगी। लोग घरों में दुबक गए, रास्ते सूने हो गए। कुम्हार ने सोचा ‘आज तो कोई दीया नहीं बिकेगा।’
तभी उसने देखा कि एक बूढ़ी माँ अपने काँपते हाथों से एक दीया खरीदने आई है। कुम्हार ने आश्चर्य से पूछा, ‘माँ, इतनी आँधी में दीया लेकर क्या करोगी? अभी तो जल भी नहीं पाएगा।’
माँ मुस्कराई और बोली, ‘बेटा, दीया इसलिए नहीं जलाती कि आँधी रुक जाए, दीया इसलिए जलाती हूँ ताकि अँधेरा हार जाए।’
उसके शब्द सुनकर कुम्हार की आँखें नम हो गईं। उसने उस दिन सिर्फ दीये नहीं बेचे बल्कि यह सीख भी पा ली कि परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, आशा का एक छोटा-सा प्रयास भी बहुत बड़ा अर्थ रखता है।
सीख:
आँधी से लड़ने के लिए बड़े हथियार नहीं चाहिए,
अँधेरे को हराने के लिए एक छोटा-सा दीया ही काफ़ी होता है।
