
◆ सूर्यकांत उपाध्याय
चौंक गए न? लेकिन यह घटना वास्तव में घटी थी, वह भी कान्हा की नगरी वृंदावन में। यह पिछली सदी के छठे दशक की बात है, जब वृंदावन आज जैसा विशाल नगर नहीं बल्कि बांकेबिहारी मंदिर के आसपास सिमटा एक छोटा-सा कस्बा था।
कस्बे के बाहरी हिस्से में एक साधारण-सी कुटिया थी। दो पक्के कमरे, एक में गोविन्द जी का पूजाघर और दूसरे में साधु महाराज अपने दो शिष्यों के साथ रहते थे। पास ही टिन शेड में रसोई और भंडार था। संपत्ति के नाम पर दान में मिली एक गऊ माता थी। आश्रम का जीवन भिक्षाटन पर चलता था। कभी कोई यात्री एक-दो रुपए चढ़ा जाता, उसी से काम चलता। इसके बावजूद संत जी प्रतिदिन 10–20 दीन-दुखियों का भंडारा अवश्य कराते थे।
फिर बरसात आई। कई दिनों तक लगातार बारिश होती रही। कोई भिक्षाटन के लिए बाहर नहीं निकल सका। दो-तीन दिन तक जमा सामग्री से काम चला, लेकिन अंतिम दिन केवल एक दिन का भोजन शेष रह गया। संत जी चिंतित हो उठे। वे भीगते हुए गोविन्द जी के मंदिर पहुँचे और पुत्रवत भाव से बोले, ‘गोविन्द, आज तो तुम्हें खिला रहा हूँ। कल से अपनी व्यवस्था तुम स्वयं कर लेना। मैं भूखा रह लूँगा, पर तुम्हें भूखा नहीं देख सकता।’
इतना कहकर वे अपने कक्ष में लौट आए। तभी एक वृद्ध महिला, पुरानी सूती साड़ी और फटी चप्पल पहने, दरवाजे पर आ खड़ी हुई। संत जी ने उसे आदरपूर्वक भीतर बैठाया। संकोच से बोले, ‘माताजी, कुटिया में कुछ भी नहीं है, इसलिए जलपान नहीं करा सकता।’
वृद्धा ने कहा, ‘स्वामी जी, मैं बस एक काम से आई हूँ।’
उसने आँचल से मुड़ा-तुड़ा दो रुपए का नोट निकालते हुए कहा, ‘कल से इसे लेकर आश्रम-आश्रम घूम रही हूँ, कि कोई मेरे दो रुपए अपने भंडारे के लिए ले ले, लेकिन सबने मुझे ठुकरा दिया।’
संत जी की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, ‘माताजी, मेरे लिए यह सौभाग्य है। लाइए, इन्हीं दो रुपयों से आज का भंडारा होगा।’
माताजी चकित रह गईं। दो रुपए में भंडारा! फिर भी वे रुक गईं। संत जी ने शिष्य से कहा, ‘माताजी के दो रुपयों का नमक ले आओ और वही आज की दाल-सब्जी में डाल दो। आज का भंडारा माताजी के नाम रहेगा।’
इसके बाद वृद्धा ने कागज़ पर सामग्री की एक सूची लिखी और अपने नौकर से कहा कि यह सब कुटिया में पहुँचा दिया जाए। अगले दिन वह अपने बेटे के साथ सारा सामान लेकर आई। तब पता चला कि वे जयपुर के बड़े उद्योगपति परिवार से हैं।
माताजी बोलीं, ‘मैं किसी सच्चे साधु की तलाश में थी।’
बाद में पास की जमीन पर भव्य आश्रम बना। संत जी अब नहीं हैं, लेकिन उनका भाव आज भी उस आश्रम में जीवित है।
आश्रम का नाम मत पूछिए, माताजी ने बताने से मना किया था।
