■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक साधक ने अपने दामाद को व्यापार के लिए तीन लाख रुपये दिए। उसका व्यापार बहुत अच्छा चल पड़ा, लेकिन उसने रुपये ससुरजी को नहीं लौटाए।
आखिरकार दोनों के बीच झगड़ा हो गया। यह झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक-दूसरे के यहां आना-जाना पूरी तरह बंद हो गया। घृणा और द्वेष का भाव भीतर तक गहरा हो गया। साधक हर समय, हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर और आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन-पूजन के समय भी उन्हें दामाद का ही चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव शरीर पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गई, समाधान नहीं मिल रहा था।
आखिरकार वे एक संत के पास गए और अपनी व्यथा कह सुनाई।
संतश्री ने कहा, “बेटा! तुम चिंता मत करो। ईश्वर-कृपा से सब ठीक हो जाएगा। तुम कुछ फल और मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाओ और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, ‘बेटा! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।’”
साधक ने कहा, “महाराज! मैंने ही उनकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगूँ!”
संतश्री ने उत्तर दिया, “परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं होता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो और दूसरे की निन्यानबे प्रतिशत, पर भूल दोनों ओर से होती है।”
साधक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहा, “महाराज! मुझसे क्या भूल हुई?”
संतश्री बोले, “बेटा! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा समझा, यह तुम्हारी पहली भूल है। तुमने उसकी निंदा, आलोचना और तिरस्कार किया, यह दूसरी भूल है। क्रोधपूर्ण आँखों से उसके दोष देखे, यह तीसरी भूल है। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी, यह चौथी भूल है। तुम्हारे हृदय में उसके प्रति क्रोध और घृणा है, यह तुम्हारी अंतिम भूल है।
इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया हुआ दुःख कई गुना होकर तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगो। नहीं तो न तुम चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है।”
साधक की आँखें खुल गईं। संतश्री को प्रणाम कर वे दामाद के घर पहुँचे। घर में भोजन की तैयारी चल रही थी। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहते ने खोला। सामने नानाजी को देखकर वह अवाक् रह गया और खुशी से झूमते हुए जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “मम्मी! पापा!! देखो कौन आए हैं! नानाजी आए हैं… नानाजी आए हैं…!”
माता-पिता ने दरवाज़े की ओर देखा और सोचा, “कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे!”
बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, “अहा! पंद्रह वर्ष बाद आज पिताजी घर आए हैं।” प्रेम से उसका गला रुंध गया, वह कुछ बोल न सकी।
साधक ने फल और मिठाइयाँ मेज़ पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद से कहा, “बेटा! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो।”
“क्षमा” शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम आँसुओं बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर पड़े और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे। ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर गिरने लगे और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित आँसू ससुरजी के चरणों में।
पिता पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा और प्रेम का अथाह सागर उमड़ पड़ा। सब शांत थे, चुप। सबकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।
दामाद उठे और रुपये लाकर ससुरजी के सामने रख दिए। ससुरजी बोले, “बेटा! आज मैं इन रुपयों को लेने नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश कर प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ। मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का अनुभव हो रहा है।”
दामाद ने कहा, “पिताजी! जब तक आप ये रुपये नहीं लेंगे, तब तक मेरे हृदय की तपन शांत नहीं होगी। कृपा करके आप इन्हें स्वीकार करें।”
साधक ने रुपये लिए और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में बाँट दिए। सभी कार में बैठे और घर लौट आए।
