■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी) जब भी वहाँ से निकलता, संत को प्रणाम अवश्य करता था।
एक दिन किरात संत से बोला, “बाबा, मैं तो मृग का शिकार करता हूँ, आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं?”
संत बोले, “श्रीकृष्ण का,” और फूट-फूटकर रोने लगे।
किरात बोला, “अरे बाबा, रोते क्यों हो? मुझे बताइए, वह दिखते कैसे हैं? मैं पकड़कर ले आऊँगा उनको।”
संत ने भगवान का मनोहर स्वरूप वर्णन कर दिया-“वे साँवले-सलोने हैं, सिर पर मोर-पंख धारण करते हैं, और बाँसुरी बजाते हैं।”
किरात बोला, “बाबा, जब तक आपका शिकार पकड़कर नहीं लाता, पानी भी नहीं पियूँगा।”
फिर वह एक स्थान पर जाल बिछाकर बैठ गया। तीन दिन प्रतीक्षा करते-करते बीत गए। दयालु ठाकुर को दया आ गई, वे भला दूर कहाँ रहते हैं! बाँसुरी बजाते हुए स्वयं ही वहाँ आ गए और जाल में फँस गए।
किरात तो उनकी भुवन-मोहिनी छवि के जाल में स्वयं ही फँस गया और एकटक श्यामसुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा। जब कुछ चेतना हुई तो उसे बाबा का स्मरण आया और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “शिकार मिल गया! शिकार मिल गया!”
फिर ठाकुरजी की ओर देखकर बोला, “अच्छा बच्चू! तीन दिन भूखा-प्यासा रखा, अब मिले हो और मुझ पर जादू कर रहे हो!”
श्यामसुंदर उसके भोलेपन पर रीझते जा रहे थे और मंद-मंद मुस्कान के साथ उसे निहार रहे थे।
किरात, कृष्ण को शिकार की भाँति अपने कंधे पर डालकर संत के पास ले आया और बोला, “बाबा, आपका शिकार लाया हूँ।”
बाबा ने जब यह दृश्य देखा तो क्या देखते हैं-किरात के कंधे पर स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं! संत के होश उड़ गए। वे किरात के चरणों में गिर पड़े। फिर ठाकुरजी से कातर वाणी में बोले, “हे नाथ! मैंने बचपन से अब तक कितने प्रयत्न किए। आपको अपना बनाने के लिए घर-बार छोड़ा, इतना भजन किया; फिर भी आप नहीं मिले, और इसे तीन दिन में ही मिल गए!”
भगवान बोले, “इसके तुम्हारे प्रति निष्छल प्रेम और तुम्हारे वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया। मुझसे इसके समीप आए बिना रहा नहीं गया। भगवान तो भक्तों और संतों के अधीन ही होते हैं। जिस पर संतों की कृपा-दृष्टि हो जाए, उसे वे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करते हैं। यह तो जानता भी नहीं था कि भगवान कौन हैं, पर संत को प्रतिदिन प्रणाम करता था। संत-प्रणाम और दर्शन का यही फल है कि तीन दिन में ही ठाकुर मिल गए।”
यही होता है संत-संगति का परिणाम।
“संत मिलन को जाइए, तजि ममता अभिमान।
ज्यों-ज्यों पग आगे बढ़े, कोटिन्ह यज्ञ समान॥”
