■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार टीवी पर एक अत्यंत अमीर व्यक्ति का साक्षात्कार लिया जा रहा था।
साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया कि, “क्या आपके जीवन में कभी ऐसी कोई घटना घटी है, जिसने आपको अत्यंत आश्चर्यचकित किया हो?”
उन्होंने कहा, “हाँ।” एक बार जब मैं अयोध्या की गलियों में घूम रहा था, तो अचानक मेरी नजर एक अस्पताल के बाहर पेड़ के नीचे बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी। उसके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और आँखें बंद थीं, लेकिन उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। वह पूरी तरह प्रार्थना में लीन था।
मैंने धैर्यपूर्वक उसकी प्रार्थना समाप्त होने की प्रतीक्षा की। फिर मैंने उससे पूछा, “तुम इतने परेशान और दुःखी क्यों हो?”
उसने बताया कि अपनी पत्नी के ऑपरेशन के लिए उसे एक लाख रुपये की तत्काल आवश्यकता है, अन्यथा वह बच नहीं पाएगी।
मैंने पूछा, “क्या तुम भगवान से सहायता माँग रहे थे?”
उसने कहा, “हाँ जी, मैं अपने भगवान से ही प्रार्थना कर रहा था।”
संयोग से उस समय मेरे पास पर्याप्त धन था, इसलिए मैंने उसे एक लाख रुपये दे दिए।
उसने तुरंत आँखें बंद कर गर्दन झुका ली, भगवान का धन्यवाद किया और मुझे भी सहायता के लिए धन्यवाद दिया।
मैं उसके इस व्यवहार से अत्यंत प्रभावित हुआ। मैंने उसे अपना कार्ड दिया, जिस पर मेरा निजी फोन नंबर और ईमेल पता लिखा था।
मैंने उससे कहा, “कभी भी आपको किसी भी चीज़ की आवश्यकता पड़े, तो आप मुझे सीधे फोन करें। सहायता आपके पास पहुँच जाएगी।”
लेकिन उसने मेरा कार्ड और प्रस्ताव दोनों ही विनम्रता से ठुकरा दिए।
उस अरबपति ने कहा, “उसने मुझे जो कारण बताया, उसे सुनकर मेरा जीवन ही बदल गया।”
उस व्यक्ति ने कहा, “आपने मुझे अपना निजी फोन नंबर और ईमेल पता दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। लेकिन जब भी मुझे किसी और चीज की आवश्यकता होगी तो मैं आपको नहीं, अपने हृदय में विराजमान भगवान को पुकारूँगा, जिन्होंने अभी-अभी आपको मेरी सहायता के लिए भेजा है।”
उसकी अपने भगवान के प्रति इतनी गहरी आस्था ने मेरे अहंकार को एक ही क्षण में चूर-चूर कर दिया।
मैं सोचने पर विवश हो गया कि कोई अदृश्य शक्ति ही मुझे वहाँ खींचकर लाई थी। उसकी सहायता करके मुझे अपार सुख की अनुभूति हुई। तभी से जब भी मैं किसी की सहायता करता हूँ, तुरंत भगवान का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा।
