■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गई। चारों ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिए अनेक उपाय करवाए, पर कोई असर न हुआ और लोग मरते रहे।
दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी आकाशवाणी हुई-“हे राजा! तुम्हारी राजधानी के बीचोंबीच जो पुराना सूखा कुआँ है, यदि अमावस्या की रात राज्य के प्रत्येक घर से एक-एक बाल्टी दूध उस कुएँ में डाला जाए, तो अगली सुबह महामारी समाप्त हो जाएगी और लोगों का मरना बंद हो जाएगा।”
राजा ने तुरंत पूरे राज्य में घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात हर घर से एक-एक बाल्टी दूध कुएँ में डालना अनिवार्य है।
अमावस्या की रात राज्य में रहने वाली एक चालाक और कंजूस ग्रामवासी ने सोचा, “सारे लोग तो कुएँ में दूध डालेंगे। यदि मैं अकेले एक बाल्टी पानी डाल दूँ, तो किसी को क्या पता चलेगा?” इसी विचार से उसने चुपचाप एक बाल्टी पानी कुएँ में डाल दिया।
अगली सुबह भी लोग मरते रहे। कुछ नहीं बदला, क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुई थी। राजा ने जब कुएँ के पास जाकर देखा, तो पाया कि पूरा कुआँ पानी से भरा है; दूध की एक बूँद भी नहीं थी। वह समझ गया कि इसी कारण महामारी दूर नहीं हुई।
दरअसल, जो विचार उस कंजूस के मन में आया था, वही पूरे राज्य के लोगों के मन में आ गया। किसी ने भी कुएँ में दूध नहीं डाला।
● शिक्षा : अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि इतने लोग हैं, कोई न कोई कर ही देगा। इसी सोच के कारण परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं। यदि हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएँ, तो समाज में आवश्यक परिवर्तन अवश्य आ सकता है।
