
■ सूर्यकांत उपाध्याय
ब्रह्मा के पुत्र मनु के एक पुत्र इला थे, जिन्हें स्त्री और पुरुष, दोनों रूपों में वर्णित किया गया है। स्त्री रूप में इला ने चंद्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के पुत्र बुध से विवाह किया। उनसे पुरुरवा का जन्म हुआ, जिन्हें पुरुवंश का जनक माना जाता है। पुरुरवा के पुत्र आयु, आयु के नहुष और नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए। ययाति के पुत्रों से अनेक राजवंश आगे बढ़े।
पुरुरवा ने देवराज इंद्र की श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी से विवाह किया, जिससे उर्वशी पुरुवंश की राजमाता बनीं। शताब्दियों बाद पांडुपुत्र अर्जुन ने उर्वशी के प्रणय-निवेदन को यह कहकर अस्वीकार किया कि वे उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थीं, इसलिए उनके लिए माता के समान हैं। अपमानित होकर उर्वशी ने अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप दिया, जो अज्ञातवास के समय उनके लिए सहायक सिद्ध हुआ। अर्जुन ने कहा कि माता के क्रोध का श्राप भी अंततः कल्याणकारी होता है।
उर्वशी और पुरुरवा की कथा तब आरंभ होती है जब उर्वशी इंद्र की आज्ञा से पृथ्वी पर आईं। पृथ्वी का सौंदर्य उन्हें भा गया और वे कुछ समय वहीं रहीं। एक दिन वन में एक राक्षस ने उनका अपहरण कर लिया। उसी समय आर्यावर्त के अधिपति पुरुरवा वहाँ पहुँचे। क्षत्रिय धर्म निभाते हुए उन्होंने राक्षस का वध कर उर्वशी को मुक्त कराया। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हुए, किंतु मर्यादा के कारण भाव व्यक्त न कर सके।
स्वर्ग लौटने पर एक नाटक में उर्वशी से भूलवश विष्णु के स्थान पर पुरुरवा का नाम उच्चरित हो गया। क्रोधित भरतमुनि ने उन्हें श्राप दिया कि वे पृथ्वी पर रहकर मानव की भाँति संतान उत्पन्न करें। यह श्राप उनके लिए वरदान सिद्ध हुआ। पृथ्वी पर पुनर्मिलन के बाद विवाह से पूर्व उर्वशी ने तीन शर्तें रखीं, दो प्रिय मेषों की रक्षा, घी का सेवन, और सहवास के अतिरिक्त नग्न रूप में न दिखना। पुरुरवा ने स्वीकार किया।
इंद्र ने छलपूर्वक मेषों का अपहरण कराया और बिजली चमकाकर पुरुरवा को निर्वस्त्र दिखा दिया। शर्त भंग होते ही उर्वशी स्वर्ग लौट गईं, यद्यपि बाद में मिलन होता रहा। उनसे आयु सहित नौ पुत्र हुए। आगे चलकर आयु, नहुष और ययाति के माध्यम से पुरुवंश तथा यदुवंश का विस्तार हुआ। यह कथा हिंदू परंपरा की प्राचीन और पवित्र प्रेमगाथाओं में गिनी जाती है।
