■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक निर्धन औरत एक साधु के पास गई और बोली, “स्वामी जी! कोई ऐसा पवित्र मंत्र लिख दीजिए, जिससे मेरे बच्चों का रात को भूख से रोना बंद हो जाए।”
साधु ने कुछ पल एकटक आकाश की ओर देखा, फिर अपनी कुटिया के अंदर गए और एक पीले कपड़े पर एक मंत्र लिखकर उसे ताबीज की तरह लपेटकर उस महिला को दे दिया।
साधु ने कहा, “इस मंत्र को घर में उस जगह रखना, जहाँ तुम अपनी मेहनत की कमाई का धन रखती हो।”
महिला प्रसन्न होकर चली गई।
ईश्वर की कृपा से उस दिन उसके पति की आमदनी ठीक हुई और बच्चों को भरपेट भोजन मिल गया। रात शांति से कट गई। अगले दिन भोर में ही उन्हें घर के आँगन में पैसों से भरी एक थैली मिली। थैली में धन के अलावा एक पर्ची भी थी, जिस पर लिखा था- “कोई कारोबार कर लें।”
इस बात पर अमल करते हुए उस औरत के पति ने एक छोटी-सी दुकान किराए पर ले ली और काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे कारोबार बढ़ने लगा और दुकानें भी बढ़ती गईं। मानो पैसों की बारिश होने लगी।
एक दिन पति की कमाई तिजोरी में रखते समय उस महिला की नजर मंत्र लिखे कपड़े पर पड़ी। वह सोचने लगी, “न जाने साधु महाराज ने ऐसा कौन-सा मंत्र लिखा था कि हमारी सारी तंगी दूर हो गई?”
सोचते-सोचते उसने वह कपड़ा खोल दिया।
उसमें लिखा था-
“जब पैसों की तंगी समाप्त हो जाए, तो सारा पैसा तिजोरी में छिपाने की बजाय कुछ पैसे ऐसे घर में डाल देना, जहाँ से रात को बच्चों के रोने की आवाज़ें आती हों।”
