■ सूर्यकांत उपाध्याय

अन्धे ने कहा, “हाय! भगवान् ने मुझे अंधा बना दिया, अन्यथा मैं संसार का कितना उपकार करता। अपने सुख की तनिक भी परवाह न कर, सदा दीन-दुखियों की सेवा में लगा रहता।”
लंगड़े ने कहा, “यदि मेरे पैर ठीक होते तो मैं दौड़-दौड़कर अच्छे कार्य करता, जीवों की भलाई करता; पर क्या करूँ, मेरे पांव ही साथ नहीं देते।”
निर्धन बोला, “जब मैं गरीबों को धनाभाव से पीड़ित देखता हूँ तो मेरा हृदय व्यथित हो उठता है। यदि मेरे पास धन होता, तो मैं सबकी सहायता करता और अत्याचार का विरोध करता।”
मूर्ख ने कहा, “यदि मैं विद्वान होता, तो अपनी विद्या को कभी बेचता नहीं, उसे केवल लोककल्याण में लगाता।”
निर्बल ने कहा, “यदि मैं बलवान होता, तो अत्याचारियों से लड़ता और पीड़ितों की रक्षा करता।”
समय बदला। अन्धे को दृष्टि मिली, लंगड़ा चलने लगा, निर्धन धनी हो गया, मूर्ख विद्वान बना और निर्बल बलवान हो गया।
परन्तु परिवर्तन के साथ उनके विचार भी बदल गए। दृष्टि पाने वाला रूप-सौन्दर्य में खो गया। लंगड़ा स्वार्थ में डूबकर धन कमाने में लग गया। धनवान अपने धन को ही सर्वोपरि मानने लगा। विद्वान ने ज्ञान को स्वार्थ का साधन बना लिया और बलवान ने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने में किया।
कुछ समय बाद फिर परिस्थितियाँ बदलीं। सभी अपनी-अपनी पुरानी अवस्था में लौट आए। तब उन्हें अपने पूर्व संकल्प याद आए, पर अवसर हाथ से निकल चुका था।
● शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हमारे पास सामर्थ्य, ज्ञान, धन या शक्ति हो, तभी उसका सदुपयोग करना चाहिए।
