▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक समय की बात है। देवर्षि नारद भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ धाम पहुँचे। श्रीहरि ने नारद जी का भव्य स्वागत किया और उन्हें उचित सम्मान प्रदान किया। विदा होने के समय जब नारद जी कक्ष से बाहर निकले, तब उन्होंने छिपकर सुना कि भगवान विष्णु माता लक्ष्मी से कह रहे हैं, ‘देवी, जिस स्थान पर नारद बैठे थे, उस स्थान को तत्काल गाय के गोबर से लीपकर पवित्र कर दो।’
यह सुनकर नारद जी स्तब्ध रह गए। वे तुरंत वापस लौटे और रुंधे गले से बोले, ‘प्रभु! एक ओर आपने मेरा इतना सत्कार किया और दूसरी ओर मेरे जाने के बाद उस स्थान को अपवित्र मानकर उसे शुद्ध करने का आदेश दिया। ऐसा क्यों?’
भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, ‘नारद! अतिथि और देवर्षि होने के नाते आपका सम्मान करना मेरा धर्म था, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से आप ‘निगुरा’ अर्थात गुरुहीन हैं। जिस स्थान पर गुरुहीन व्यक्ति बैठता है, वह स्थान अपनी सात्विकता खो देता है।’
नारद जी को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने पूछा, ‘प्रभु, मैं किसे अपना गुरु बनाऊँ?’
विष्णु जी ने कहा, ‘पृथ्वी लोक पर जाओ। जो व्यक्ति तुम्हें सबसे पहले मिले, उसे ही अपना गुरु स्वीकार कर लो।’
धरती पर उतरते ही नारद जी की भेंट एक साधारण मछुआरे से हुई। नारद जी दुविधा में पड़ गए। उन्होंने सोचा, ‘यह अनपढ़ मछुआरा मुझे क्या सिखाएगा?’ वे वापस वैकुंठ गए और अपनी शंका व्यक्त की। तब भगवान ने कठोर स्वर में कहा, ‘नारद! अपने प्रण से पीछे मत हटो। गुरु की योग्यता नहीं, शिष्य का समर्पण देखा जाता है।’
विवश होकर नारद जी ने उस मछुआरे को अपना गुरु बना लिया। किंतु गुरु बनाने के बाद भी उनके मन में मछुआरे के प्रति आदर का भाव नहीं जागा। उन्होंने पुनः भगवान विष्णु से कहा, ‘प्रभु, मेरे गुरु को तो स्वयं कुछ नहीं आता, वे मेरा उद्धार कैसे करेंगे?’
गुरु की निंदा सुनकर भगवान विष्णु क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, ‘नारद! तुम गुरु-निंदा के अपराधी हो। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हें 84 लाख योनियों के चक्र में भटकना पड़ेगा।’
भयभीत होकर नारद जी ने क्षमा माँगी और इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा। भगवान ने कहा, ‘इसका उपाय भी तुम्हें तुम्हारे गुरु ही बता सकते हैं।’
नारद जी तुरंत अपने गुरु, उस मछुआरे, के पास पहुँचे और पूरी घटना सुना दी। गुरु मुस्कुराकर बोले, ‘वत्स! घबराओ मत। भगवान से कहना कि वे धरती पर 84 लाख योनियों के चित्र बनवा दें। फिर तुम उन चित्रों के ऊपर लेटकर गोल-गोल घूम लेना और कहना कि प्रभु, मैं 84 लाख योनियों में भटक आया हूँ, अब मुझे क्षमा करें।’
नारद जी ने वैसा ही किया। उनकी बुद्धिमत्ता और गुरु की युक्ति देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, ‘नारद! देखा, जिस गुरु को तुम अज्ञानी समझ रहे थे, उन्हीं की शरण ने तुम्हें मेरे श्राप से बचा लिया। यही गुरु की महिमा है।’
