
▪️मुंबई
मुंबई की पहचान केवल उसकी गगनचुंबी इमारतों और भागती-दौड़ती जिंदगी से नहीं, बल्कि उन पुराने ईरानी कैफे से भी है जो आज भी शहर के कई सड़क-कोनों पर अपनी विरासत को संजोए हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन कैफे का इतिहास केवल भोजन और चाय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रवास, संघर्ष, उद्यमिता और वास्तु मान्यताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार 18वीं और 19वीं शताब्दी में ईरान में अकाल, गरीबी और धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए अनेक ईरानी पारसी मुंबई पहुंचे। सीमित संसाधनों के कारण उन्होंने शहर के उन त्रिकोणीय और कोने वाले भूखंडों को चुना जिन्हें उस समय कम शुभ माना जाता था। ऐसे भूखंड अपेक्षाकृत सस्ते थे, जबकि व्यावसायिक दृष्टि से वे बेहद लाभदायक साबित हुए।
इन स्थानों पर स्थापित कैफे धीरे-धीरे मुंबई की सामाजिक और सांस्कृतिक धड़कन बन गए। मिल मजदूरों, टैक्सी चालकों, बंदरगाह कर्मियों, छात्रों और दफ्तरों में काम करने वाले लोगों के लिए ये कैफे मिलन केंद्र बन गए। ब्रून-मक्खन, ईरानी चाय, अखुरी, खीमा-पाव, मावा केक और बेरी पुलाव जैसे व्यंजन इनकी खास पहचान बने।
इन कैफे की सजावट भी अपनी अलग कहानी कहती है। पुरानी लकड़ी की कुर्सियां, संगमरमर की मेजें, दीवारों पर ईरानी प्रतीक और समय की मार झेलती क्रॉकरी आज भी बीते दौर की याद दिलाती हैं।
1950 और 1960 के दशक में मुंबई में 350 से अधिक ईरानी कैफे थे, लेकिन आज उनकी संख्या घटकर लगभग 35 रह गई है। बढ़ती संपत्ति कीमतों, बदलती जीवनशैली और नई पीढ़ी की कम रुचि के कारण कई प्रतिष्ठित कैफे बंद हो चुके हैं।
फिर भी, ईरानी कैफे केवल भोजनालय नहीं हैं। वे ‘पुरानी बंबई’ की जीवित स्मृतियां हैं, जहां इतिहास, संस्कृति और मानवीय आत्मीयता आज भी एक कप चाय के साथ परोसी जाती है।
