■ सूर्यकांत उपाध्याय

भगवान् से माँगने के संदर्भ में एक प्रेरक कथा प्रचलित है। एक बार भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर भ्रमण पर निकले। चलते-चलते वे घने जंगल में पहुँच गए। कुछ दूर आगे बढ़ने पर एक सुनसान मैदान मिला, जहाँ न कोई पेड़ था, न पौधा। ग्रीष्म ऋतु थी और प्रचंड गर्मी पड़ रही थी। अर्जुन को तीव्र प्यास लगी, परंतु कहीं जल दिखाई नहीं दे रहा था। उन्होंने अपनी प्यास भगवान् से कही। श्रीकृष्ण ने उन्हें जल खोजने को कहा।
तलाश करते हुए अर्जुन को दूर एक झोपड़ी दिखाई दी। वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि एक वृद्ध तपस्विनी संन्यासिनी बैठी है, जिसके पास जल से भरा घड़ा रखा है। अनुमति लेकर अर्जुन ने जल पिया और तृप्त हुए।
तभी उनकी दृष्टि कुटिया में टंगी एक नंगी तलवार पर पड़ी। उन्हें आश्चर्य हुआ कि इस वृद्धा के पास तलवार क्यों है।
अर्जुन ने विनम्रता से पूछा, “माँ! यह तलवार क्यों रखी है?”
वृद्धा क्रोधित होकर बोली, “यदि अर्जुन और द्रौपदी मिल जाएँ, तो उनके सिर काट दूँ।” यह सुनकर अर्जुन चकित रह गए।
उन्होंने कारण पूछा। वृद्धा ने कहा, “द्रौपदी ने मेरे प्रभु को अपनी रजस्वला साड़ी का वस्त्र बनाया, यह बड़ा अपराध है। और अर्जुन ने तो उनसे भी बड़ा अपराध किया, जिनकी पूजा करनी चाहिए, उन्हें अपना सारथी बना लिया, उनके हाथों में लगाम और चाबुक दे दी।”
यह सुनकर अर्जुन ने मन ही मन स्वीकार किया कि वृद्धा की भावना में गहरी भक्ति छिपी है। उन्होंने लौटकर श्रीकृष्ण को सब बताया। भगवान् मुस्कराए और बोले, “अब तुम ही विचार करो, क्या उचित है? हम तो तुम्हारे हैं ही।”
इस कथा का सार यह है कि भगवान् से सांसारिक वस्तुएँ माँगने के स्थान पर समर्पण भाव रखना चाहिए।
सर्वोत्तम प्रार्थना यही है -“हे नाथ! आपकी इच्छा ही पूर्ण हो।”
