■ सूर्यकांत उपाध्याय

रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसा उल्लेख मिलता है कि जीवन भर उन्होंने मां काली की पूजा-अर्चना की, लेकिन अंततः उन्हें लगने लगा कि यह तो द्वैत ही है, अभी ‘एक’ का अनुभव नहीं हुआ। यह प्रीतिकर और सुखद तो है, पर दो तो दो ही बने हुए हैं। कोई स्त्री से प्रेम करता है, कोई धन से, कोई पद से; उन्होंने मां काली से प्रेम किया, लेकिन प्रेम अभी भी दो में बंटा है। अभी परम अद्वैत का अनुभव नहीं हुआ, इससे उन्हें पीड़ा होने लगी। तब वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई अद्वैतवादी, कोई वेदांती, कोई ऐसा व्यक्ति आ जाए जिससे उन्हें मार्ग मिल सके।
एक परमहंस ‘तोतापुरी’ वहां से गुजर रहे थे। रामकृष्ण ने उन्हें रोक लिया और कहा, “मुझे एक के दर्शन करा दें।” तोतापुरी ने कहा, “यह कौन-सी कठिन बात है? तुम दो मानते हो, इसलिए दो हैं; मान्यता छोड़ दो!” पर रामकृष्ण ने कहा, “मान्यता छोड़ना बड़ा कठिन है। जन्म भर उसे साधा है। आंख बंद करता हूं तो काली की प्रतिमा खड़ी हो जाती है। मैं रस में डूब जाता हूं और भूल जाता हूं कि एक होना है। ध्यान करने की चेष्टा करता हूं तो द्वैत उपस्थित हो जाता है।”
तोतापुरी ने कहा, “ऐसा करो, जब काली की प्रतिमा बने, तो एक तलवार उठाकर उसके दो टुकड़े कर देना।” रामकृष्ण ने पूछा, “तलवार वहां कहां से लाऊंगा?” तोतापुरी बोले, “जब काली की प्रतिमा कल्पना से आती है, तो तलवार भी वहीं से ले आना। यह सब कल्पना ही है। जिसे तुमने जीवन भर साधा और दोहराया है, वह प्रगाढ़ हो गई है। सभी को आंख बंद करने पर काली नहीं दिखाई देती।”
ईसाई आंख बंद करता है तो उसे क्राइस्ट दिखाई देते हैं। कृष्ण-भक्त को कृष्ण, बुद्ध-भक्त को बुद्ध और महावीर-भक्त को महावीर दिखाई देते हैं। जो साधना की जाती है, वही रूप उभर आता है।
रामकृष्ण ने काली की साधना की थी, इसलिए वह कल्पना अत्यंत प्रगाढ़ हो गई थी। बार-बार के स्मरण से वह इतनी यथार्थ प्रतीत होती थी कि जैसे काली सामने खड़ी हों। वास्तव में वहां कोई नहीं, केवल चैतन्य ही है।
तोतापुरी ने फिर कहा, “आंख बंद करो और तलवार उठाकर उस प्रतिमा को तोड़ दो।” रामकृष्ण आंख बंद करते, पर हिम्मत नहीं जुटा पाते। भक्त के लिए भगवान को काटना अत्यंत कठिन था।
संसार को छोड़ना सरल है, पर मन की गहन कल्पनाओं को छोड़ना अत्यंत कठिन। भक्ति के स्वप्न सुखद होते हैं, इसलिए उन्हें त्यागना और भी कठिन हो जाता है।
आंखों से आंसू बहने लगते, शरीर गदगद हो जाता, पर तलवार नहीं उठती। अंततः तोतापुरी ने कहा, “बहुत हो गया, या तो तुम करो या मैं चला जाता हूं।”
अगले दिन तोतापुरी एक कांच का टुकड़ा लेकर आए। उन्होंने कहा, “जब तुम ध्यान में डूबने लगो, तो मैं तुम्हारे माथे पर यह कांच लगाऊंगा। उसी क्षण तुम साहस करके तलवार उठाना और प्रतिमा को दो भागों में विभाजित कर देना।”
जब रामकृष्ण ने आंख बंद की, काली की प्रतिमा उभरी। वे भाव-विभोर होने ही वाले थे कि तभी तोतापुरी ने उनके आज्ञा-चक्र पर कांच से आघात किया। रक्त बह निकला। उसी क्षण रामकृष्ण ने साहस जुटाया, कल्पना की तलवार उठाई और काली की प्रतिमा के दो टुकड़े कर दिए।
जैसे ही यह हुआ, अद्वैत का अनुभव प्रकट हो गया, मानो लहर सागर में विलीन हो गई हो, सरिता समुद्र में समा गई हो। कहा जाता है कि वे छह दिनों तक उस परम शून्य में लीन रहे-न भूख, न प्यास, न बाहरी जगत की कोई सुध।
जब छह दिन बाद उन्होंने आंखें खोलीं, तो उनके मुख से पहला वचन निकला- “आखिरी बाधा गिर गई!”
