■ आत्मसमर्पण का बढ़ा ग्राफ

● नई दिल्ली
देश में लंबे समय से सक्रिय माओवादी आंदोलन अब निर्णायक दौर में नजर आ रहा है। सुरक्षा बलों की सख्ती और पुनर्वास की योजनाओं के संतुलित संयोजन ने इस विद्रोह की कमर तोड़ दी है। पिछले एक दशक में 10 हजार से अधिक माओवादियों का आत्मसमर्पण इस बदलती तस्वीर का स्पष्ट संकेत है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने माओवाद के पूर्ण उन्मूलन के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय की है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में 2,300 से अधिक माओवादी मुख्यधारा में लौटे, जबकि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 630 से ज्यादा कैडरों ने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन को अपनाया। 2014 के बाद से आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि अब सरकार की रणनीति अधिक संगठित और परिणामोन्मुख हो गई है।
कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से चर्चित इलाकों-जो बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के हिस्सों में फैला था, में अब विकास की रफ्तार तेज हुई है। जहां पहले ठेकेदार काम करने से कतराते थे, वहीं अब सड़कों और पुलों का जाल बिछाया जा रहा है। पीएलजीए के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन को प्रमुख परियोजनाएं सौंपी गई हैं, जिनमें कई अहम सड़कें और पुल शामिल हैं।
माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में 15 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण हो चुका है, जिनमें से 12,250 किलोमीटर पिछले दस वर्षों में बने हैं। वहीं, सुरक्षित पुलिस थानों की संख्या 2014 के 66 से बढ़कर 586 तक पहुंच गई है। यह बदलाव संकेत देता है कि अब इन क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ विकास भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
