■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

कवि, गीतकार सुरेश मिश्र के बारे में पिछले कई दशकों से मेरा मानना यह है कि वह मुंबई महानगर के श्रेष्ठ मौलिक कवियों में अग्रिम पंक्ति के साहित्यकार हैं। हास्य सम्राट मंच संचालक हैं। डमरू छंद के विशेषज्ञ हैं। पारंगत लोक कवि हैं। चाहे सोशल मीडिया हो या काव्य व साहित्यिक मंच, हरेक जगह अत्यधिक सक्रिय रहने वाले रचनाकारों में उनकी गिनती होती है। साथ ही गांव, समाज व प्रकृति से भी उनका एक अनोखा रिश्ता है। वे समाज सेवा में भी अग्रणी रहते हैं। मुझे यह आश्चर्य भी होता है कि शिक्षक के रूप में पूर्णकालिक सरकारी नौकरी और साहित्य साधना में वह कैसे सामंजस्य स्थापित करते हैं। एक पत्रकार के रूप में वे विभिन्न अखबारों में नियमित कॉलम लिखते हैं। इसके अलावा उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि देश और दुनिया की प्रमुख घटनाओं पर वह त्वरित काव्यात्मक टिप्पणी करने में भी सिद्धहस्त हैं।
कवि सुरेश मिश्र की नवीनतम कृति है- दोहे श्रृंगार के। इसमें उन्होंने श्रृंगार को दोहा छंद के माध्यम से छांदिक अनुशासन में बांधते हुए श्रृंगार रस के दोनों पक्षों- वियोग श्रृंगार व संयोग श्रृंगार का कुशलता से निर्वाह किया है।
112 पेज की इस कृति के प्रकाशक हैं मुंबई के सुप्रसिद्ध रचनाकार एड राजीव मिश्र मधुकर जिन्होंने प्रतीक पब्लिकेशन के जरिए इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। पुस्तक में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के पूर्व कार्याध्यक्ष डॉ शीतला प्रसाद दुबे व सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ राज बुंदेली का मंतव्य है। पुस्तक में तीन खंड हैं- मंगलाचरण, वियोग श्रृंगार और संयोग श्रृंगार। मंगलाचरण में पहला दोहा है-
प्रथम पूज्य हे गजबदन, एकदंत गणराज,
रिद्धि सिद्धि सद्बुद्धि दो, पूर्ण करो सुचि काज।
इस खंड में कवि ने मां शारदा, श्री राम, श्री कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, हनुमान जी, कुलदेवी व कुल देवताओं, बेल्हा माई, मां शीतला, मां वाराही बाबा बेलखरनाथ, चौकिया, विंध्यवासिनी की रचनात्मक आराधना की है।
वियोग श्रृंगार का पहला दोहा है-
पिया पाती भेजे नहीं, नहीं उठावे फोन,
पीर फगुनही हिया की, भला सुने अब कौन।
संयोग श्रृंगारखंड की शुरुआत इस दोहे से होती है-
सपने में साजन मिले, मिले नैन से नैन,
निरखूँ बनकर बावली, मूक हुए मम बैन।
सुरेश मिश्र की ‘दोहे श्रृंगार के’ पुस्तक के दोहे कबीर, तुलसी, जायसी, रहीम व बिहारी की परंपरा के अप्रतिम दोहे हैं। जिसमें खड़ी हिंदी के साथ अवधी, भोजपुरी, बज बुंदेली, उर्दू व फारसी भाषा के शब्द मिलते हैं तो पारंपरिक काव्य रचना के साथ मोबाइल व इंटरनेट का उल्लेख भी उपस्थित दिखता है। इससे सुरेश मिश्र जी की काव्य प्रतिभा के दर्शन हमको भली-भांति इस कृति में दिखता है। कवि सरल, सहज शब्दों के इस्तेमाल से अपनी भावनाएं पाठकों तक संप्रेषित करने में बेमिसाल है। दरअसल वे काव्यात्मक अनुशासन का पालन कुशलता पूर्वक करते हैं इसलिए इसमें पाठकों को उपमा, यमक, अनुप्रास अलंकारों की छटा भी दिखाई पड़ेगी। दो उदाहरण देखें-
कानन कोयल कूकती, कर्कश कागा धाम,
कंत ‘काम’ कैसे करूं, आग लगाए ‘काम’।
‘जल’ बिनु जैसे ‘जल’ रहे, जंगल जलज जमीन,
जिया जरे जज्बात में, पिया बजावे बीन।
कृति में यथेष्ट चित्रों का भी प्रयोग किया गया है। पुस्तक की साज सज्जा और मुख पृष्ठ आकर्षक है इसके लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। कुल मिलाकर ‘दोहे श्रृंगार के’ एक अप्रतिम काव्यात्मक कृति है जिसके लिए कवि सुरेश मिश्र जी बधाई के पात्र हैं। पुस्तक का मूल्य 300 रुपए है।
