■ सूर्यकांत उपाध्याय

मनुष्य को यह शंका नहीं करनी चाहिए कि मेरा पाप कम था, पर दंड अधिक मिला, अथवा मैंने पाप किया ही नहीं, फिर भी दंड मिल गया। सर्वज्ञ, सर्वसुहृद् और सर्वसमर्थ भगवान का विधान है कि कोई भी पाप से अधिक दंड नहीं भोगता; जो दंड मिलता है, वह किसी न किसी पाप का ही फल होता है।
एक गाँव में एक सज्जन रहते थे। उनके घर के सामने एक सुनार का घर था, जिसके पास अक्सर सोना आता और वह गहने बनाकर कमाई करता था। एक दिन उसके पास अधिक सोना जमा हो गया। रात में पहरा देने वाले एक सिपाही को यह पता चल गया। उसने रात में सुनार की हत्या कर दी और सोने का बक्सा लेकर चल पड़ा।
उसी समय सामने रहने वाले सज्जन लघुशंका के लिए बाहर आए और सिपाही को पकड़ लिया। सिपाही ने उन्हें धमकाया और कहा कि बक्से का कुछ हिस्सा ले लो, नहीं तो मुसीबत में पड़ जाओगे। सज्जन ने मना कर दिया। तब सिपाही ने उन्हें ही चोर बताकर अन्य सिपाहियों को बुला लिया। सबने मिलकर उन्हें पकड़ लिया और अदालत में पेश किया। झूठे साक्ष्यों के आधार पर उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई।
सज्जन ने इसे अन्याय कहा। जज को संदेह हुआ और उसने एक योजना बनाई। अगले दिन एक व्यक्ति की नकली हत्या का दृश्य रचकर उसी सिपाही और सज्जन को वहाँ भेजा गया। रास्ते में सिपाही ने अपराध स्वीकार कर लिया। यह बात छिपे हुए व्यक्ति ने सुन ली और अदालत में बता दी। सिपाही पकड़ा गया।
फिर जज ने सज्जन से पूछा तो उन्होंने स्वीकार किया कि पूर्व में उन्होंने क्रोध में आकर एक व्यक्ति की हत्या की थी। तब जज ने कहा कि यह उसी पाप का फल है।
इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है-चाहे इस जन्म में या अगले जन्म में।
