■ सूर्यकांत उपाध्याय

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीनकर इसका सिर काट लेना चाहिए।
किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने देखा- मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया।
यह देखकर वे गदगद हो गए। वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?
बहुधा हमें ऐसा ही भ्रम हो जाता है कि मैं न होता तो क्या होता?
परन्तु यह क्या हुआ?
सीता जी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गए कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।
आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में एक बंदर आया है और वह लंका जलाएगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता में पड़ गए कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है।
और त्रिजटा कह रही है कि उसने स्वप्न में देखा है कि बएक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु की इच्छा।
जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिए दौड़े,
तो हनुमान जी ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की।
और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है तो हनुमान जी समझ गए कि मुझे बचाने के लिए प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जाएगा, पर उसकी पूंछ में कपड़ा लपेटकर, घी डालकर आग लगाई जाए।
तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी।
वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहाँ से घी, तेल और कपड़ा लाता, और कहाँ आग ढूंढ़ता? पर वह प्रबंध भी प्रभु ने रावण से ही करा दिया।
जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है।
इसलिए सदैव याद रखें कि संसार में जो कुछ हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है। हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं।
इसीलिए कभी भी यह भ्रम न पालें कि मैं न होता, तो क्या होता?
