- समय से पहले पके फल बन रहे खतरा, सावधानी जरूरी

● मुंबई
गर्मी ने दस्तक दे दी है और मौसम तेजी से करवटें बदल रहा है। कहीं बारिश तो कहीं तेज हवाएं आम के बौर को झड़ने पर मजबूर कर रही हैं। इससे बागान मालिकों को नुकसान की चिंता सता रही है। इसके बावजूद बाजार में पके आम की आवक शुरू हो चुकी है, जो स्वाभाविक नहीं बल्कि कृत्रिम प्रक्रिया का परिणाम है।
मौसम के अनुरूप फलों की उपलब्धता से उनकी गुणवत्ता और कीमत संतुलित रहती है। लेकिन अधिक मुनाफे की चाह में कुछ व्यापारी फलों को समय से पहले बाजार में उतार रहे हैं और दो से तीन गुना तक लाभ कमा रहे हैं। आम, केला और पपीता जैसे फलों के साथ यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
बाजार में दिख रहे आम देखने में आकर्षक जरूर लगते हैं, लेकिन उनकी चमक बनावटी होती है। इनमें प्राकृतिक सुगंध का अभाव होता है और पास लाने पर आंखों में जलन तक महसूस होती है। यह संकेत है कि इन्हें रसायनों के जरिए पकाया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई व्यापारी कैल्शियम कार्बाइड जैसे खतरनाक रसायनों का उपयोग कर फलों को समय से पहले पका देते हैं। ऐसे फल बाहर से पके दिखते हैं, लेकिन अंदर से कच्चे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। इनका सेवन अनजाने में लोगों को बीमारियों की ओर धकेल सकता है।
ऐसे में जरूरी है कि उपभोक्ता सतर्क रहें और केवल प्राकृतिक रूप से पके फलों का ही सेवन करें। स्वास्थ्य के साथ समझौता किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।
कई पीढ़ियों से आम के बागों की देखभाल कर रहे अनुभवी लोगों का अनुभव इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण चेतावनी देता है। उनका कहना है कि कार्बाइड जैसे रसायनों से पकाए गए आम भले ही व्यापारियों को अधिक मुनाफा दे दें, लेकिन यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।
जानकार बताते हैं कि केमिकल से पकाए गए आमों की पहचान करना कठिन नहीं है। ऐसे आमों का रंग एक समान चमकीला पीला होता है, जो देखने में आकर्षक लगता है, लेकिन यह प्राकृतिक नहीं होता। इसके अलावा, इनकी सतह पर काले धब्बे या सफेद पाउडर जैसी परत भी नजर आ सकती है, जो रसायनों के उपयोग का संकेत है।
इसके विपरीत, प्राकृतिक रूप से पके आमों में हरे और पीले रंग का संतुलित मिश्रण दिखाई देता है। उनकी खुशबू ही उनकी असली पहचान होती है, जो दूर से ही ताजगी और गुणवत्ता का एहसास कराती है।
विशेषज्ञों की मानें तो उपभोक्ताओं को केवल बाहरी चमक पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि फल की सुगंध, रंग और बनावट को ध्यान में रखकर ही खरीदारी करनी चाहिए। जागरूकता ही इस कृत्रिम खतरे से बचाव का सबसे कारगर उपाय है।
