■ सूर्यकांत उपाध्याय

पौराणिक काल की बात है। एक बार सहस्रणीक के मन में यह जिज्ञासा हुई कि हिरण्यकश्यप जैसे विष्णु-द्रोही के घर में प्रह्लाद जैसा महान विष्णु-भक्त कैसे उत्पन्न हुआ। उन्होंने इस विषय में श्री मार्कण्डेय से प्रश्न किया।
मार्कण्डेय ने कथा आरंभ की दिति और कश्यप के पुत्र हिरण्यकश्यप अत्यंत बलशाली दैत्य था। एक समय ऐसा आया कि त्रिभुवन उसके अधीन माना जाने लगा। अपार शक्ति प्राप्त कर उसमें अहंकार उत्पन्न हुआ और वह और अधिक शक्तियां प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करने लगा। उसके तप से पृथ्वी कांप उठी, प्रकृति विचलित हो गई और चारों ओर भय का वातावरण बन गया।
दरबारियों और बंधुओं ने उसे समझाया कि तीनों लोक उसके अधीन हैं, देवताओं पर विजय प्राप्त है, फिर इस तपस्या का क्या प्रयोजन? किंतु अहंकारवश उसने किसी की बात नहीं मानी और कैलाश पर जाकर तप करने लगा।
कुछ समय बाद ब्रह्मा चिंतित हुए कि यदि यह दैत्य सफल हो गया तो सृष्टि के लिए संकट उत्पन्न हो जाएगा। तभी देवर्षि नारद ने उन्हें आश्वस्त किया और एक युक्ति से उसकी तपस्या भंग करने का निश्चय किया। नारद और पर्वत मुनि पक्षी का रूप धारण कर कैलाश पहुंचे और नारायण नाम का उच्चारण करने लगे। यह सुनकर हिरण्यकश्यप का ध्यान भंग हो गया और क्रोध में उसने तप छोड़ दिया।
नगर लौटने पर उसकी पत्नी कयाधु ने तप अधूरा छोड़ने का कारण पूछा। हिरण्यकश्यप ने अनमने भाव से बताया कि ‘नारायण’ नाम सुनने से उसका व्रत भंग हुआ। उसी समय अनजाने में उसके मुख से बार-बार ‘नारायण’ नाम का उच्चारण हुआ।
मार्कण्डेय ने कहा, ‘उसी क्षण के प्रभाव से गर्भस्थ बालक प्रह्लाद जन्म से ही भगवान विष्णु का अनन्य भक्त बना। यह भगवान की लीला थी कि विष्णु-द्रोही के घर में महान विष्णु-भक्त का जन्म हुआ।’
