■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार की बात है। गोस्वामी तुलसीदास जी अवध में थे। वे सरयू नदी में स्नान करने आए।
जब वे नदी में उतरकर भीतर की ओर जा रहे थे, उसी समय एक महिला भी वहाँ स्नान करने पहुँची। उसे शीघ्र स्नान करना था।
उसने तुलसीदास जी को देखकर प्रणाम किया और कहा, “बाबा जी! मुझे शीघ्र स्नान करना अनिवार्य है। आप उस ओर मुख करके नदी में खड़े हो जाइए। आपको आपके राम जी की शपथ है, जब तक मैं न कहूँ, आप न पीछे मुड़कर देखेंगे, न नदी से बाहर निकलेंगे।”
गोस्वामी जी ने भी उस महिला को आश्वासन देकर नदी में उसकी ओर पीठ घुमाकर खड़े हो गए।
कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। महिला जल्दी-जल्दी स्नान करके चली गई। जल्दबाजी में वह गोस्वामी जी को पीछे मुड़ने व बाहर निकलने के लिए कहना भूल गई। इस कारण गोस्वामी जी घंटों नदी में ही खड़े रहे।
जब काफी देर हो गई और गोस्वामी जी मंदिर नहीं पहुँचे, तब लोग हर जगह उन्हें ढूँढने लगे। ढूँढते-ढूँढते पता चला कि गोस्वामी जी स्नान करने गए थे और अभी तक वापस नहीं आए हैं।
उनके साथ के लोग सरयू नदी के किनारे पहुँच गए। वहाँ उन्होंने देखा कि गोस्वामी जी नदी में खड़े हैं।
उन्होंने गोस्वामी जी से बाहर निकलने का आग्रह किया। तब गोस्वामी जी ने मना करते हुए कहा, “मैं बाहर नहीं निकल सकता।
एक महिला ने मुझसे शपथ ली है। यदि वह देवी मुझे बाहर निकलने को कहेंगी, तभी मैं बाहर निकल सकता हूँ।”
तुलसीदास जी की बात सुनकर सभी लोग हैरान हो गए। धीरे-धीरे यह बात राजा के पास पहुँच गई। राजा कुछ समझ नहीं पाए और शीघ्र ही गोस्वामी जी के पास पहुँचे।
राजा ने गोस्वामी जी से बाहर निकलने की विनती करते हुए कहा, “किसी व्यक्ति की शपथ के कारण इस कड़ाके की ठंड में नदी में खड़े रहना स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण आपका स्वास्थ्य है।”
परंतु गोस्वामी जी ने उन्हें मना करते हुए कहा, “मेरे लिए मेरे प्रभु का नाम सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। उस देवी ने मुझे मेरे प्रभु श्री राम की शपथ दिलाई थी। उनका नाम मेरे पूरे अस्तित्व से भी अधिक महत्वपूर्ण है।”
राजा ने गोस्वामी जी से पूछा, “बाबा जी! उन देवी का नाम क्या है? वे कहाँ की रहने वाली हैं?”
इस पर तुलसीदास जी ने कहा, “मुझे ज्ञात नहीं है।” तब राजा ने पूरे अवध में ढोल बजवाकर उस महिला को शीघ्र सरयू नदी के तट पर उपस्थित होकर गोस्वामी जी को शपथ-मुक्त करने का आदेश दिया।
उस महिला को जैसे ही अपनी गलती का आभास हुआ, वह दौड़ती हुई नदी के तट पर पहुँच गई।
वहाँ हाथ जोड़कर क्षमा याचना करते हुए वह गोस्वामी जी से कहने लगी, “बाबा जी! अब आप पीछे मुड़ सकते हैं और नदी से बाहर भी निकल सकते हैं।”
फिर वह बोली, “हे बाबा जी! मुझसे बड़ा अपराध हुआ है। मैं दंड की भागी हूँ। यदि आपकी दया हो, तो मुझे क्षमा करें।”
गोस्वामी तुलसीदास जी मुस्कराते हुए बोले, “नहीं देवी! आपसे कोई अपराध नहीं हुआ है। मेरे प्रभु चाहते थे कि मैं यहाँ एकांत में सरयू जी के जल में उनकी भक्ति करूँ।
मुझे ऐसा करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।”
ऐसे होते हैं सिद्ध पुरुष!
