■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक गरीब ब्राह्मण अपने खेत में बहुत मेहनत करता था। एक दिन वह थककर एक पेड़ के नीचे आराम कर रहा था। तभी उसे एक बिल से एक नाग निकलता हुआ दिखाई दिया। ब्राह्मण ने सोचा, “मुझे इस नाग की रोज पूजा करनी चाहिए। इसकी कृपा से शायद मेरे खेतों में अच्छी फसल होने लगे।”
उस शाम उसने उस नाग को दूध अर्पित किया और कहा, “हे खेतों के रक्षक, मैं आपको यह दूध अर्पित कर रहा हूँ। कृपया मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।”
अगली सुबह जब ब्राह्मण आया, तो उसने दूध के कटोरे में एक सोने का सिक्का पाया। वह प्रतिदिन नाग को दूध चढ़ाता और नाग कटोरे में एक सोने का सिक्का छोड़ जाता। जल्द ही वह ब्राह्मण अमीर हो गया।
एक दिन ब्राह्मण को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। उसने अपने बेटे से नाग को दूध अर्पित करने के लिए कहा।
लड़के ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। अगले दिन जब वह बिल के पास गया, तो उसे एक सोने का सिक्का मिला।
लड़के ने सोचा, “इस बिल के अंदर जरूर बहुत सारे सोने के सिक्के होंगे। क्यों न मैं नाग को मारकर सारे सिक्के निकाल लूँ?”
उस शाम उसने साँप को लाठी से मारने की कोशिश की। नाग को क्रोध आ गया और उसने लड़के को डँस लिया। नाग के विष से लड़के की मृत्यु हो गई।
ब्राह्मण जब शहर से वापस आया, तो उसे सारी घटना का पता चला। उसने नाग को कोई दोष नहीं दिया। अगली शाम वह बिल के पास गया और नाग को दूध अर्पित किया।
घायल नाग ने क्रोधित होकर ब्राह्मण से कहा, “तुम अपने बेटे की मृत्यु को इतनी जल्दी भूल गए और सोने के सिक्कों के लालच में फिर यहाँ आ गए। अब मैं तुम्हारा मित्र नहीं रह सकता। तुम यहाँ श्रद्धा से नहीं, लालच के कारण आते थे।”
यह कहकर नाग ने ब्राह्मण को एक हीरा दिया और उसे दोबारा वहाँ आने से मना कर दिया।
शिक्षा : अति लालच बुरी बला होती है।
